सन 84 के दिनों में मेरे बड़े भाई विचार जगत की दो पत्रिका नियमित रूप से पढ़ा करते थे। अंग्रेजी की पत्रिका 'मेनस्ट्रीम' और हिन्दी की 'विचार बोध'। विचार बोध में यदा कदा वे लिखा भी करते। पहली पत्रिका के बारे में बौद्धिक जगत को बताने की जरुरत नहीं जबकि दूसरी पत्रिका अल्पज्ञात है। जहाँ तक मुझे स्मरण है, 'विचार बोध' पत्रिका पटना के लंगरटोली से प्रकाशित हुआ करती। संपादक और प्रकाशक विजय चन्द्र प्रसाद चौधरी के बड़े भाई कृष्ण चंद्र चौधरी थे। संक्षेप में उन्हें वी सी पी कहा जाता। आधुनिक भारतीय इतिहास में उनकी विशेषज्ञता थी।
तब मैं भी 'विचार बोध' पढ़ा करता था लेकिन वी सी पी के बारे में जानता कुछ न था। इसी काल में उनकी एक संपादित किताब हाथ लगी। नाम था 'भारतीय इतिहास लेखन : एक अंतरराष्ट्रीय विवाद'। कहने की जरुरत नहीं कि यह विवाद रामशरण शर्मा की किताब 'प्राचीन भारत' को प्रतिबंधित किये जाने से पैदा हुआ था। वी सी पी की उक्त किताब इसी परिघटना का अनिवार्य नतीजा थी। इस किताब में इतिहास के बीसियों विद्वान के लेख छपे थे। इस किताब को पढ़कर मुझे न सिर्फ इतिहास का महत्त्व समझ में आया बल्कि यह भी कि इतिहास लेखन के क्षेत्र में कौन-कौन से विद्वान सक्रिय हैं और उनका स्टैंड क्या है। आप कह ले सकते हैं कि 'अंतरराष्ट्रीय विवाद' की इस किताब को पढ़कर मैं असमय ही 'विवादी' हो चला था। खुद वी सी पी की छवि एक 'विवादी इतिहासकार' की बन चुकी थी। मैं उन्हें एक 'एक्टिविस्ट इतिहासकार' कहना पसंद करता हूँ। और बात है कि कभी-कभी उनका 'एक्टिविज्म' उनके अंदर के इतिहासकार को भी कमतर साबित कर डालता था। एक्टिविज्म के अपने खतरे होते हैं। ये खतरे उन्हें भी उठाने पड़े। लेकिन उस आदमी ने मिजाज कुछ ऐसा पाया था कि खतरों से भी संजीवनी बटोर लेता था। मुझे याद है कि एम ए में दाखिले के बाद मैं विजय कुमार ठाकुर से मिलने गया था। यह बताने के प्रयोजन से कि अगर आप स्वीकारें तो मैं हिस्ट्रियोग्राफी पढ़ना चाहूंगा। उन्होंने पूछा कि हिस्ट्रियोग्राफी में कुछ पढ़ा भी है? मैंने कहा कि ई एच कार की 'व्हाट इज हिस्ट्री', वी सी पी चौधरी की 'भारतीय इतिहास लेखन : एक अंतरराष्ट्रीय विवाद' आदि किताबों के साथ इतिहास पुस्तकों की प्रस्तावना, भूमिका भी पढ़ चुका हूं। वे कुछ खास बोले तो नहीं लेकिन मुझे लगा कि शायद कुछ अवांछित कहा जा चुका है। इस बात का स्पष्टीकरण तब हुआ जब एक बार एक व्याख्यान के लिए मैंने वी सी पी के नाम का प्रस्ताव किया। इतिहास विभाग में मैं और अशोक कुमार ने 'इतिहास विचार मंच' का गठन किया था। उस मंच की ओर से हम व्याख्यान के निमित्त इतिहास के विद्वानों को बुलाया करते। इसी क्रम में एक बार मैंने वी सी पी चौधरी को बुलाने की बात कही तो वे बोले, 'उनके नाम पर बहुत विवाद होगा'। तत्काल तो मैं बात समझने में असमर्थ रहा किन्तु बाद में अन्य स्रोतों से पता चला कि दरअसल चौधरी जी ने श्री ठाकुर के पिता उपेंद्र ठाकुर पर किताब की चोरी का मुकदमा कर रखा है। यह था चौधरी जी का एक्टिविज्म, जो समझौते की भाषा न पढ़ सका।
'एक देहाती की विदेश-यात्रा'
85-86 में मेरे बड़े भाई वीसीपी चौधरी के पास ज्यादा जाने लगे। वे उन दिनों 'सोशियो-इकनॉमिक आस्पेक्ट्स ऑफ कम्युनल रायट्स इन बिहार' (1890-...) विषय पर शोधरत थे। वीसीपी चौधरी से उन्हें आवश्यक खुराक मिल जाया करती थी। चौधरी जी के यहां बुद्धिजीवियों का दरवार लगा करता था। तरह-तरह के बुद्धिजीवी उसमें भाग लेते और भूमिका अदा करते। विजय ठाकुर से पहले केवल उन्हीं के घर विद्वानों का जमघट लगता। ठाकुर जी ने, बहुत संभव है, दरवार की संस्कृति वहीं से सीखी हो।
भाई समय-समय पर वीसीपी की लिखी किताबें भी लाया करते। 'क्रिएशन ऑफ मॉडर्न बिहार' तथा 'इम्पीरिअल हनीमून विद इंडियन अरिस्टोक्रेसी' के साथ उन्होंने एक और किताब लायी थी। इस किताब का नाम आचार्य शिवपूजन सहाय जी की पुस्तक 'देहाती दुनिया' की ध्वनि से मिलता-जुलता था। नाम था 'एक देहाती की विदेश यात्रा'। दरअसल इसमें चौधरी जी की इंग्लैंड-यात्रा की कहानी है। जैसाकि उस समय रिवाज था, एक आम भारतीय का पहनावा धोती-कुरता ही हुआ करता था। किन्तु मित्रों की राय हुई कि इंग्लैंड में यह परिधान नहीं चलता। वीसीपी चौधरी भी कोई गांधी तो थे नहीं कि जिद कर बैठते। इसलिए उन्होंने कोट-पैंट सिलने के लिए दिया। जब सिलकर तैयार हुआ तो मित्रों के समक्ष उसकी फिटिंग चेक की गई। दर्जी की कई बार की कोशिश के बाद भी जब कोट चौधरी जी पर फिट नहीं बैठ पाया तो उन्होंने अपने दिल को समझाना ही श्रेयस्कर समझा। मान चुके थे कि सारा दोष उनके शरीर का है। 'आलू की बोरी' को भला कोई ड्रेस कैसे फिट हो सकता है!
'एक देहाती की विदेश यात्रा' में चौधरी जी ने अंग्रेजों का कुछ दिलचस्प हाल लिखा है। 'ब्रिटिश जेंटलमैन' की अवधारणा सिर्फ भाषा तक महदूद नहीं है। वे बगैर ड्रेस के घर से बाहर नहीं निकल सकते। चौधरी जी ने तो यहां तक लिखा है कि अगर किसी अंग्रेज के मकान में आग लग जाय तो भी वे बगैर ड्रेस के बाहर न निकलें। पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई है। अपने यहां तो ड्रेस को 'विलासिता' समझा जाता रहा है। मैंने अपने बचपन में देखा है कि लोग कुरता को पहनते नहीं थे कंधा पर रख छोड़ते थे। इसी तरह वे अपने रिश्तेदार के यहां से भी हो आते। कोई-कोई आदमी अगर ज्यादा सभ्य हुआ तो रिश्तेदार के गांव पहुंचने से पहले धोती-कुरता पहन लेते। लौटती बेर फिर वहीं खोल भी लेते। अपने यहां गांधी अकेले नहीं हैं जो 'अर्धनग्न' रहते। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, सहजानंद सरस्वती और चंद्रशेखर आजाद से लेकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तक की अर्धनग्न तस्वीरें आपको मिल जाएंगी। पूरे कपड़ों में मुझे अबतक एक ही भारतीय मिला। ओमप्रकाश पांडेय। मित्र हैं। जब भी उनके घर जाना हुआ वे पैंट-शर्ट के ऊपर टाई बांधे मिले। लगा जैसे मैं अभी न आता तो कविमित्र कहीं चल दिये होते। लेकिन घर से बाहर शायद ही निकलते। एक लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के बारे में बचपन में सुनता था कि अंग्रेज महल पर हमला कर चुके थे और उन्हें नौकर का इंतजार था कि वह आये तो जूते पहनाये। उनकी यह 'विलासिता' हमारी स्मृति में अपराधी के रूप में दर्ज है।
अलबत्ता चौधरी जी ने अंग्रेजों के भोजन-प्रेम के बारे में नहीं लिखा। हिन्दी में नाश्ता और भोजन ही मुख्यरूप से चलता है किंतु उनकी जुबान में ब्रेकफास्ट, लंच, ब्रंच, डिनर और सपर जैसे कई शब्द हैं। उनके साहित्य-दर्शन आदि तक पर इस भोजन-प्रेम का प्रभाव देखा जा सकता है। इस विषय पर अज्ञेय हमारी कुछ मदद करते नजर आते हैं-'अंग्रेजों के बारे में मैं अनुभव से जानता रहा हूँ कि वह जाति प्रायः काल की और दिक की नाप एक भोजन और दूसरे भोजन के बीच के अंतराल से करती है।' (अज्ञेय, संवत्सर, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, 1978, पृष्ठ 46) 'अंग्रेज हमेशा देश-काल की नाप भोजन के आधार पर करते हैं।' (वही) इसलिए आप कह ले सकते हैं कि 'अँग्रेज के अनुभव-जगत में भूख या कि आहार देश-काल से बड़ा सत्य है।' (वही)
वीसीपी चौधरी : इतिहास की मुक्ति
आज पत्र-पत्रिकाएं इतिहास लेखन की अनिवार्य स्रोत बन चुकी हैं। लेकिन इतिहास का एक दौर था जब विश्व स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं को इतिहास के स्रोत के रूप में उपेक्षित और अविश्वसनीय समझा जाता था। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, वीसीपी चौधरी ने आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड का रास्ता चुना था। वहां के इतिहासकारों और विश्वविद्यालयों के बीच इतिहास के स्रोत के रूप में पत्रकारिता के प्रति जो उपेक्षा-भाव था उसे चौधरी जी अपनी पुस्तक 'इतिहास का मुक्ति संघर्ष : स्वार्थ से यथार्थ तक' (राहुल प्रेस, पटना : 1991) में लिपिबद्ध करने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है, 'जब मैं 1956 में लिटन पर लंदन विश्वविद्यालय में पी-एच. डी. का शोध-प्रबंध प्रस्तुत करने के लिए शोध-सामग्री एकत्र कर रहा था तो मेरे दर्शक प्रोफेसर सी. एच. फिलिप्स ने स्पष्ट तौर पर पत्र-पत्रिकाओं की स्रोत के रूप में उपेक्षा करने की हिदायत दी। मेरे ट्यूटर डॉ. के. ए. वॉलहैचेट ने बताया कि यह विश्वसनीय स्रोत के रूप में यहां के विश्वविद्यालयों में मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी है।' (इतिहास का मुक्ति संघर्ष : स्वार्थ से यथार्थ तक, पृष्ठ 53) इसका नतीजा यह हुआ कि 'मैंने वहां पंजीकरण कराने का इरादा छोड़कर पटना विश्वविद्यालय में डी. लिट्. के लिए शोध प्रबंध दाखिल किया। परीक्षकों में गोरखपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष तथा मगध विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने पत्र-पत्रिकाओं की स्रोत के रूप में व्यवहार करने के कारण डी. लिट्. नहीं देने का निर्णय लिया किन्तु पेनिसिलवानियाँ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होल्डन फरवर ने इसे विशिष्ट उपलब्धि मानी तथा डी. लिट्. प्रदान करने की अनुशंसा की।' (पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 53) पटना विश्वविद्यालय की यह कहानी 1962-63 की है।
कहने की जरूरत नहीं कि बिहार सरकार द्वारा तीन खंडों में प्रकाशित बिहार के राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास भी पत्रकारिता पर अलग से अध्याय नहीं देता तथा 'आकस्मिक एवं उपेक्षापूर्ण ढंग से' कहीं-कहीं इसका वर्णन करता है। इसी तरह, सरकारी प्रकाशन के रूप में कुंवर सिंह तथा अमर सिंह के जीवन वृत्तांतों में भी स्रोत के रूप में पत्रकारिता की घोर उपेक्षा की गयी। (पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 55-56)
पत्रकारिता की इस वैश्विक उपेक्षा के विरुद्ध मोर्चा खोलने वालों में वीसीपी चौधरी निस्संदेह अग्रणी इतिहासकार हैं। उनकी किताब 'इम्पीरिअल हनीमून विद इंडियन अरिस्टोक्रेसी' इस दिशा में एक साहसी प्रयास है। बिहार के बुद्धिजीवी इस बात से परिचित हैं कि सरकारी फरमान के विरुद्ध चलने के कारण इस पुस्तक के कुछ हिस्सों को प्रतिबंधित भी किया जा चुका था। किंतु आज जो कोई भी उस किताब से गुजरेगा, इतिहास की मुक्ति हेतु चौधरी जी के छेड़े संघर्ष को अवश्य याद करेगा। पत्रकारिता की मुक्ति का मार्ग भी यहीं से खुलता था।
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