आज आपकी पुण्यतिथि (22/6/1941--22/5/1993) है। आप ऐसे इंसान तो कतई नहीं थे कि रस्मी तौर पर आपको याद किया जाय। जब-जब संकट में होता हूँ आप मेरे साथ खड़े मिलते हो। आपकी दृढ़ता मेरी भाषा की रीढ़ है।
चाचा मेरे पिता से लगभग आठ साल छोटे थे, इसलिए मेरी मां ने उन्हें बचपन से देखा है। माँ की कही बातों से ही उनके बचपन का हाल मालूम होता है। बालोचित शैतानियां उनमें विद्यमान थीं। बगल के गांव नादौल से एक धोबी आते थे। नाम कदाचित सोहन था। उसे आंगन में दाखिल होते देख ही वे अन्य समवयस्क बच्चों के साथ मिल गाने लगते-
"कहाँ गेलअ सोहन? चोरी करे बाबू!
का होलो सोहन? जाग होलई बाबू!
नुका न गेलअ सोहन? दीया बारकई बाबू!
मारो खयल सोहन? बड़ मार बाबू!
कतेक मार सोहन? बेदम करकई बाबू!
आउ जयब सोहन? बान छुटतई बाबू!"
पढ़ने के क्रम में मालूम हुआ कि चाचा लोक साहित्य का पाठ कर रहे थे। साहित्य का पाठ कुछ इस रूप में है-
"कहाँ गेले सोमर ? चोरी करे बाबू!
मारो खैलें सोमर ? बड़ी मार बाबू ।
दबकले न हल सोमर ? दीया बरलक बाबू !
भगलें न हल सोमर ? सब छेंक लेलक बाबू !
फिन जयमें सोमर ? लत छुटलइ बाबू! " (संपत्ति अर्याणी, मगही लोक साहित्य, किरण प्रकाशन, जहानाबाद, प्रथम संस्करण : 1965, पृष्ठ 28)
चाचा को हम सभी भाई-बहन 'जिक्का' कहते। उनकी ट्रेनिंग थी कि जब कोई पुकारे तो हमें प्रत्युत्तर में पहले 'जी' कहना चाहिए। चाचा पुकारें तो 'जी काका'। भाषाविज्ञान के मुखसुख नियम से यह 'जीकका' और अन्ततः जिक्का हो गया। 'जी' कहने की परिपाटी उन्होंने पड़ोसी ग्रामीण द्वारिका सिंह की नकल में शुरू की होगी। द्वारिका सिंह गांव के रिश्ते के हिसाब से मेरे भाई लगते थे। उनके यहाँ के सभी बच्चे उनको 'काकाजी' कहते थे। उनका काकाजी उलटकर मेरे घर 'जीकाका' हो गया।
चाचा का नाम शिवनारायण शर्मा था। तब के मेरे गांव में शिवनारायण कई थे। नाम रखे जाने का एक अपना ही समाजशास्त्र है। एक पड़ोसी वकील का नाम भी शिवनारायण शर्मा था। स्पष्ट पहचान के लिए गाँव में उन्हें शिवनरायण वकील कहा जाता। एक शिवनारायण बढ़ई भी थे। चौथे शिवनारायण पड़ोसी गांव जमालपुर के थे और पेशे से शिक्षक होने की वजह से शिवनरायण मास्टर कहे जाते।
मुखसुख ने इन सभी शिवनारायण को शिवनरायण बना दिया था। तीन शिवनारायण का सरनेम शर्मा था। सरनेम शर्मा होने से भूमिहार जाति के लोगों को थोड़े में शर्माजी कहा जाता। गांव के हेडमास्टर रामनंदन शर्मा को हमलोग 'शर्माजी' ही कहते। मेरे छोटे चाचा कृष्णनंदन शर्मा होने से अपने कार्यालय में 'शर्माजी' कहे जाते। दोनों चाचा एक ही विभाग (बिजली) में नौकरी करते थे। छोटे चाचा की नौकरी बड़े चाचा की कृपा थी। चाचाओं की आपसी बातचीत में शर्माजी शब्द बार-बार आता। मेरे बालमन को लगता कि यह शर्माजी भी कोई सरकारी ओहदा है।
बिहार में भूमिहार जाति के लोगों को कूटभाषा में 'श्रीबाबू' भी कहा जाता है। पटना के जिस मुहल्ले में फिलहाल रहता हूँ उसे 'श्रीनगर' कहा जाता है। बहुत दिनों तक इस नामकरण का रहस्य मेरे लिए अज्ञात बना रहा। मेरे ससुरजी इस मुहल्ले के आरंभिक बाशिंदों में से थे। उनसे सुना करता था कि श्रीकृष्ण बाबू के नाम पर मुहल्ले का नाम 'श्रीनगर' रख छोड़ा गया है। किन्तु यह पूरा सच नहीं था शायद। एक दिन मुहल्ले के एक आदमी को कहते सुना कि "यह मुहल्ला 'श्रीबाबू' लोगों का है।" यानी भूमिहारों का मुहल्ला। एजी कॉलोनी मुख्य सड़क के पूरब में 'केसरी नगर' है तो पश्चिम में 'श्रीनगर'। कहने को तो कलक्टर सिंह 'केसरी' और श्रीकृष्ण बाबू बिहार के दो महापुरुष के नाम हैं, लेकिन मूल में जाति है।
चाचा पहले कांग्रेसी रहे फिर कम्युनिस्ट हुए। उनका जीवन दोनों के आदर्शों से प्रेरित था। आदर्श को व्यवहार में उतारने की जिद थी। होली और दसहरे के अवसर पर हम तमाम भाई-बहनों के अंगवस्त्र सिले जाते। कपड़े की सही माप और उसकी सिलाई के लिए हम सभी चाचा के संग स्थानीय और निकटतम बाजार मसौढ़ी जाते। चाचा ने दुकान और कपड़ा निश्चित कर रखा था। रामगुलाम साव की कपड़े की दुकान होती और मफतलाल कंपनी के सूती कपड़े होते। कपड़े की सिलाई का जिम्मा नईम मियाँ का होता। उनकी नाक पर मोटे फ्रेम का चश्मा अंटका होता। कहना मुश्किल होता कि वे ऐनक के भीतर से झांकते है अथवा ऊपर से। नईम मियाँ के बगैर हमारी क्या होली और क्या दिवाली। जो कपड़ा चाचा को पसंद आता उसी की कमीज हम सब के हिस्से आती। कपड़े का किस्म तो समान होता ही, रंग चुनने तक की आजादी नहीं होती। कभी-कभी अन्य साथियों को टेरी कॉटन तथा पॉलिस्टर की कमीज पहने देखता तो हमारा भी जी मचलता और हमलोग चाचा पर दबाव भी डालते लेकिन दृढप्रतिज्ञ इंसान तनिक टस से मस न होते। कपड़े की खरीददारी के बाद हमलोग सड़क पारकर नईम मियाँ की दुकान पर लाइन लगाते। दो-तीन दिन बाद हमारे सिले वस्त्र घर आते और उन्हें पहनकर देखते कि ठीक ठाक सिले हैं अथवा नहीं।
मेरे घर-परिवार में पढ़ाई-लिखाई की परंपरा की नींव चाचा ही ने डाली। वे घर के पहले मैट्रिक पास थे, इसलिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना से प्राप्त उनका प्रमाणपत्र बड़ी शान से दीवार में टंगा रहता। किन्तु घर में किताबें नहीं थीं। देखे में केवल एक किताब थी लाल जिल्दवाली और इसका शीर्षक, जहां तक मुझे याद है, 'क्रांति में जूछे की भूमिका' था और इसके लेखक किम इल सुंग थे। यह किताब मेरे चाचा की थी। चाचा उस किताब को एक बक्स में बंद रखते और खास अवसरों पर पढ़ते। उक्त किताब को पढ़ते वे खास एहतियात बरतते। घोर धार्मिक व्यक्ति धर्मग्रंथों के साथ जो सलूक करता है, कुछ-कुछ वैसा ही। पढ़ते और फिर सहेजकर रख देते। मैं उस किताब को उतनी ही देर देखता जितनी देर तक वे पढ़ रहे होते। हां, पढ़ चुकने के बाद वे अपने हस्ताक्षर अवश्य करते। किताबों के बगैर मैं बड़ा तो हुआ किन्तु चाचा की सादगी से भरी जीवनशैली मेरे अंदर विचार में परिणत होती रही। आठवीं कक्षा में 'जनशक्ति' (मेरे विद्यालय के तीन शिक्षक कम्युनिस्ट विचारों के थे, शायद उनके दबाव से यह अखबार आता रहा हो) दैनिक में 'पीपुल्स बुक हाउस' द्वारा रूसी किताबों की विज्ञापित सूची के आधार पर मैंने चार किताबों का चयन किया-'कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र', 'साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था', 'कम्युनिस्ट समाज में नैतिकता' तथा 'काल्पनिक और वैज्ञानिक समाजवाद'। ये किताबें मैंने पड़ोस के एक आदमी से, जो मेरे सबसे बड़े भाई के सहपाठी रह चुके थे, मंगवाई थीं। उन्होंने किताबें लाकर सीधे चाचा के हाथ में दे डाली। नतीजा-किताबों को दायमूलहब्स (कालेपानी) की सजा और मुझे डांट। मार्क्सवादियों की जीवनशैली ने चाचा के मन को एक खास तरह के 'अपराध-बोध' से भर दिया था। वे अब 'पश्चाताप' और 'आत्मसुधार' वाली मुद्रा ओढ़े रहते और मार्क्सवाद को 'वेस्ट ऑफ टाइम' घोषित करते। परिणामत: मेरी किताबें भी चाचा की किताब के साथ बक्स में बंद हो गईं।
किताब पढ़ने से ज्यादा वे लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करने में विश्वास रखते थे। इसी संपर्क की बदौलत उन्होंने बिजली बोर्ड में लोअर डिविजनल क्लर्क की नौकरी हासिल की थी। जहानाबाद में चंहरिया गाँव है जहाँ के मधेश्वर शर्मा सन 60 के दशक में बिजली बोर्ड के चेयरमैन रहे थे। वे रिश्ते में चाचा के मामू लगते थे। उन्हीं की कृपा से यह नौकरी हासिल हुई थी। इस रिश्ते की वजह से नामी-गिरामी लोगों के बीच उनका उठना-बैठना हो गया था। उनके संपर्क को व्यापक बनाने में बिजली बोर्ड की उनकी जनसंपर्क शाखा भी मददगार साबित हुई थी। प्रेस-मालिक रणधीर शर्मा, कांग्रेसी नेता रामाश्रय शर्मा, डॉ. सी. पी. ठाकुर आदि से लेकर किंग महेन्द्र तक उनकी पकड़ में थे। कहना अनावश्यक है कि फरवरी 90 की मेरी शादी में सी. पी. ठाकुर भी बारातियों में शामिल थे। सी. पी. ठाकुर एक तरह से उनके फेमिली डॉक्टर थे। परिवार के लोगों के साथ कई अन्यों का इलाज भी उनसे कराया करते। इलाज के सिलसिले में एक बार मुझे भी ले गये थे। अक्सर मेरा स्नोफिल्स बढ़ जाया करता। एक अन्य परिचित डॉक्टर की सलाह से मैं ऐसी हालत में रेसोफिल और बेनाड्रिल कैप्सूल लेता। सन 87 की बात है, जब बीमार पड़ा तो चाचा सी. पी. ठाकुर के पास ले गये। उन्होंने यूनिकार्बाजाइम के साथ ब्रॉडीसिलिन कैप्सूल (500) की दो गोली एक साथ सम्भवतः प्रत्येक चार घंटे पर लेने को कहा। शाम तक लगा कि मुंह में धूल उड़ रही है। मैंने सोचा, डॉक्टर इस तरह अपनी फीस वसूल कर रहे हैं। लेकिन अंतिम नतीजा किसी चमत्कार से कम न साबित हुआ। एसनोफिल्स की समस्या सदैव के लिए जाती रही।
चाचा ने इस सम्पर्क का अपने लोगों के लिए लाभ उठाया था। तब नौकरी की आजकल वाली मारामारी नहीं थी। उन्होंने कई लोगों को दिलवाई। कई की तो बिजली बोर्ड ही में पक्की हो गई। छोटे चाचा की नौकरी भी उन्हीं की कृपा थी। बचपन में सुनते थे कि नौकरी के साक्षात्कार में चाचा से कोई कविता सुनाने को कहा गया था। उन्होंने 'नर हो न निराश करो मन को/कुछ काम करो, कुछ काम करो' कविता सुनानी शुरू ही की थी कि इंटरव्यू बोर्ड में बैठे लोग वाह वाह कर बोल उठे : 'इस व्यक्ति में काम करने की अदम्य लालसा है।' बस नौकरी पक्की। चाचा आज के कवि होते तो कहते कि कविता हमें रोटी नहीं दे सकती कि वह किसी काम की नहीं क्योंकि उससे न चोली बन सकती है न दामन। उस अकवितावादी दौर में भी चाचा ने कविता को जंगल से निकालकर जनता तक पहुंचाने का काम किया था। इन चाचा के साले की नौकरी भी उन्होंने ही लगवाई थी। तब चपरासी की नौकरी के लिए साइकिल चलाना आना अत्यावश्यक था। हमलोग गाँव में उनके लिए साइकिल का प्रबंध करते और वहीं खेल के मैदान में पैडल मारना सिखाया जाता। अब तो उनकी साइकिल ने काफी गति पकड़ ली है।
चाचा एक कमिटेड इंसान थे। बात चाहे संबंधों की हो, विचारधारा की हो अथवा ब्रांड की। वे हमेशा खादी पहनते। मोटीवाली, खुरदरी खादी। सफेद रंग की। धोती भी खादी की। गर्मी में चमड़े का चप्पल और जाड़े में मोची का बनाया काले रंग का स्वदेशी जूता। भयानक ठंड में भी फूल बाँह की एक वेस्ट बंगाल गंजी के ऊपर कुर्ता डाले मस्त रहते। सुबह घर से निकलते तो रात को लौटते। तब शहर सपना नहीं बना था। सपना गांव में बसा संयुक्त परिवार की बेहतरी था। हालांकि गांव के अन्य घरों में संयुक्त परिवार अब दम तोड़ने लगा था किन्तु चाचा ने उस टूटन को अपने घर में प्रवेश की इजाजत नहीं दी थी। वे भतीजों को बेटों की तरह पालनेवाली पीढ़ी के वंशधर होना चाहते थे। टूटते संयुक्त परिवार के दौर में हमारा घर ढाढ़स बंधा रहा होता।
कविता में चाचा का स्मरण :
*दिवंगत चाचा के प्रति-1*
हमारी भाषा में
महज एक शब्द नहीं थे
संबंधों की लहलहाती आग थे
उष्णता से जिसकी
पूस की ठंडक में
सिहरता था मेरा हठीला बचपन।
अपने गांव के विशाल
सार्वजनिक कुएं से ज्यादा गहरे थे
जगत से जिसकी लटकती
एक बार में
सैकड़ों छोटी-बड़ी बाल्टियां
नहीं कांपी कभी
पानी की सतह
विचलित नहीं हुई कभी!
पता नहीं कितनी बार
कौतूहल में
हाथों से सरसराकर छोड़ी
बाल्टी की रस्सी
मापने को थाह
किंतु अबूझ रहा आजतक
पकड़ से बाहर
आदिम, अजनबी स्रोत! (रचनाकाल : 18/9/96)
*दिवंगत चाचा के प्रति-2*
सघन बड़ी मूंछों को
चीरती निकलती तुम्हारी हंसी
फैल जाती थी
पूरे घर की हवा में
काट डालती निज का सन्नाटा
जैसे क्षितिज पर निकलता
लाल गोल सूरज
फैलाकर समस्त प्रकाश
पाट देता है
संपूर्ण पृथ्वी की
पहाड़ों-घाटियों की अतल गहराइयों को
तुम भी थे कितने अद्भुत
कहते रहे गांधी को
‘नेहरू का पालतू कुत्ता’
खुद पहना उसी का बाना
खादी की फटी धोती में
लिपटी तुम्हारी काया
बनी रही अजेय
अपनी ही दृढ़ता से
बीमार मौसम में
दी तुमने गाली
सबसे ज्यादा मार्क्स को
और खुद को चिपका पाया
किम इल सुंग की जिल्दों में
उलझा रहा बेबस मन
खो गया उन्हीं अक्षरों में कहीं
हर पढ़े पन्ने में
छोड़ जाते थे अपने
दबंग दस्तखत के निशान
समझ न पाया मैं तुम्हारा राज़
कि क्यों तुम्हें
जींस पैंट के ऊपर पहना हमारा कुरता
नहीं भाया कभी
कहो-कैसा-?
कैसा था तुम्हारा सौंदर्य-बोध ?
घर की एक-एक चीज़
जो थी तुम्हारी
धरी है सब की सब
अभी तक सुरक्षित
म्यूजियम में पड़ी तलवारों की तरह नहीं
एक जीवित मनुष्य की तरह
जो बात करती है अक्सर
तोड़ती है दूसरे कइयों के
अंदर का सन्नाटा
जब-जब टिकती है मेरी नज़र
ज़ोरों की आवाज़ से फड़फड़ाता है
उसका सारा पन्ना
संजोकर रखा था जिसे मैंने
तुम्हारे जाने के बाद
मचलती है दुधमुंही बच्ची-सी
देने को सहारा
घर के कोने में पड़ी निस्संग
तुम्हारी लाठी
एक दिन अचानक पकड़ूंगा उसे
और निकल जाऊंगा दूर
बहुत दूर…
पार उसके भी
बंद होते हैं जहां हमारे रास्ते
पूरी दुनिया के तमाम रास्ते
मिट्टी, पानी और हाड़-मांस की
नहीं बनी थी तुम्हारी काया
दौड़ती थी खून की जगह नसों में
तेज़ रफ़्तार की जिद
जीवन ज़िद था तुम्हारे लिए
इच्छाएं ज़िद थीं
प्यार भी ज़िद था
बिलकुल ज़िद की तरह आई तुम्हारी मृत्यु
हंसो
हंसो कि तुम्हारी संतानें
कहीं ज्यादा सख़्त हैं
सिखाया नहीं करना
‘तुच्छ जीवन’ के लिए
‘महान समझौते’
हाय! कहो-
यह भी कोई ज़िद थी तुम्हारी ? (रचनाकाल : 3.11.96)
दोनों कविता 'सप्तपदीयम' काव्य-संग्रह से साभार
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