माँ सम्पूर्ण है तो पुत्र उसका अंशमात्र. अंश, सम्पूर्ण को कैद करने में असमर्थ है. सम्पूर्ण की संघर्षगाथा को भाषा के किसी फॉर्म में लिपिबद्ध करने में अंश समर्थ नहीं हो सकता. उसकी भाषा शब्दों से परे और इतर होगी. अतः, मैं माँ की चर्चा इस कंफेशन के साथ शुरू करना चाहूँगा :
"मेरी कविताओं में अक्सर
पत्नी होती है
या होती है अनाम प्रेमिका
मां नहीं होती
कैसे कहूं-
चाहता हूं जब भी
शुरू करना तुमसे
कविता दरक जाती है!"
1934 के भूकंप का बिहार और मेरी माँ के जीवन में खास स्थान रहा है. मां कहतीं कि जब वह पैदा हुईं तो धरती डोली थी. स्त्री के जन्म से धरती का कांपना नया तो नहीं था, लेकिन उसकी स्मृति में यह घटना सहज भाव से व्याप्त थी. तब इतना कैलेण्डरीकरण न हुआ था. जन्म-वर्ष याद रखने का यही सबसे मुफीद तरीका था.
माँ का नाम बालमती देवी था. पता नहीं यह नाम किनका दिया हुआ था, किन्तु उन्होंने चाह 'बालमति' की रखी होगी. हालांकि नाम चाहे जो हो इससे वास्ता नहीं ही पड़ना था. स्त्रियों की पहचान उसकी व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं थी. वह मृत्यु के दिन तक 'देहुनीओली' (मगही में वाली, ओली है) उच्चार के साथ पुकारी जाती रही. #जहानाबाद जिले में घोसी के पास देहुनी उनका प्यारा गाँव था. मुझे मां का नाम तब मालूम हुआ जब 90 के आसपास उनको डॉक्टर महेन्द्र नारायण के यहाँ इलाज के सिलसिले में लाया गया. पुर्जा बनानेवाले को उसने अपना नाम बालमती देवी बताया. यह वो दौर था जब जब एक स्त्री की पहचान उसके पति से थी. लोग उसका नाम न पूछकर पति का नाम पूछते थे. पड़ोस की नेबारी (गाँव) चाची थी. किसी ने उनके पति का नाम पूछा तो बोली कि 'वही, जहाँ बड़का-बड़का जहाज आकर रुकता है'. आध घंटे की मशक्कत और माथापच्ची के बाद प्रश्नकर्त्ता महेंद्रू घाट से होते हुए महेन्द्र सिंह तक पहुंचा. 'आनंदमठ' की कल्याणी ने भी 'अपने पति का नाम नहीं बताया, वह पति का नाम नहीं ले सकती थी'. संयोग कि उसके भी पति का नाम महेंद्र सिंह है। मेरे पिता का नाम लालबहादुर सिंह होने से मां के जीवन से 'लाल' रंग ही गायब हो गया. 'गुलाबी' के सहारे जिंदगी कटती रही.
बालमति अर्थात बच्चों की बुद्धि. बच्चा यानी निश्छल और निर्दोष. सांसारिक फरेब जान लेने के बाद बचपन गायब हो जाता है. उनकी निश्छलता का एक किस्सा है. बात मेरे बचपन की है. दो-तीन साल का रहा हूँगा. मुझे साथ लेकर संभवतः गंगास्नान हेतु पटना आयी थी. कलक्टरी घाट का इलाका था. किसी फलवाले से उन्होंने कुछ खरीदा. पैसे कुछ कम पड़ गये थे इसलिए पास के डेरे से शेष लाकर देने की बात कही. फलवाला इस बात के लिए राजी नहीं हो पा रहा था साथ ही उसने कुछ ऐसी बात कह दी कि जिससे माँ का मन आहत हो गया. चोट खायी माँ ने फलवाले के पास मुझे गिरवी रख दी. गनीमत कि दस कदम की दूरी पर पिता मिल गये और मैं बंधकी से मुक्त हो सका.
वह बचपन ही से 'माँ' की मूर्ति थी. माँ यानी ममता, सेवा-भाव, समर्पण और त्याग की भावना से भरी हुई. दूसरी जमात तक की शैक्षिक यात्रा में उन्हें प्रेमचंद की तरह इलहाम हो गया था कि विद्या पढ़ने से नहीं बल्कि गुरु के आशीर्वाद से आती है. इस अर्जित ज्ञान को ढाल बनाकर वह दीदीजी (शिक्षिका) की सेवा में लगी रहतीं. और बात है कि किताबी पढ़ाई में उनका मन न रमता था. तीसरी जमात तक पहुचते-पहुंचते यह पढ़ाई निस्सार लगने लगी और विद्या देवी की तरफ से मन उचट गया. गुरु के आशीर्वाद से उन्होंने विद्या की जगह बुद्धि (विवेक) हासिल की थी. मेरी मामा (दादी) कहा करती थीं-'बिना बुद्धि के विद्या विषम अर्थात बुद्धि (विवेक) न हो तो विद्या, जहर है. मां इस जहर को पी चुकी थी. मेरी मगही में एक शब्द चलता है. बाबा अक्सर उसका प्रयोग करते. 'बुधव्याधी' उनका प्यारा शब्द था. बुद्धि को अगर विवेक की वल्गा से शासित न किया जाय तो वह व्याधि बन जाती है. माँ को यह व्याधि छू तक नहीं पाई थी.
मां की जब शादी हुई तब वे दस वर्ष की थीं. पिता बारह वर्ष के थे. शादी के बाद की सुबह विदाई की तैयारी के बीच दोनों समधी में कहा-सुनी हो गई. मामला दहेज का था. डोली में बैठी 'बालमति' चुपके से निकल पड़ी. अगले क्षण बेटी की विदाई में रोती संवासिनों से भरे आँगन में दाखिल थी. विदा न होने की जिद पर अड़ी हुई. दो साल बाद ही ससुराल आई. 'कन्या-परिछन' का समय आया. 'परिछन' अपने मूल रूप में 'परीक्षण' रहा होगा शायद. परीक्षा का गोतिया. इसके डर से विद्यार्थी के हाथ--पांव पहले ही से फूले रहते हैं. तिसपर परीक्षक अगर मेरी मामा (दादी) जैसी हो तो साक्षात यम का सामना. मामा की कन्या-परीक्षण-बुद्धि के किस्से गांव की हवा में फैले हुए थे. गांव की औरतें कहतीं कि "कन्या को अगर 'सरकार जी' ने पास कर दिया तो पास". बचपन में सुनता था कि मामा पड़ोस में किसी नयी बहुरिया को देखने गई हुई थी. बहुरिया के शरीर पर गोदना की हल्की रेखा दिख गई. बस, मामा ने घोषित कर दिया कि कन्या निम्नजातीय है. यह वो दौर था जब गोदना से जाति की कुंडली पढ़ ली जाती थी. उस दादी के लिए काली बहू का स्वागत करना असंभव था. दादी को काले लोग कतई पसंद नहीं थे. दादी औसत कद की गोरी-चिट्टी महिला थीं. पिता भी गोरे थे. दादी ने बहू का मुंह देखा कि सूप में रखा परिछन का सारा सामान फेंककर आसमान सिर पर उठा लिया. किसी तरह मामला शांत हुआ. प्राकृतिक न्याय के तहत हम छः भाई-बहनों में तीन गोरे तीन काले हुए. पिता ने संतानों का बंटवारा किया. गोरी संतानें पिता की और काली संतानें मां की. गर्व है कि मैं मां की संतान हो सका.
मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें 'कानी' और 'लंगड़े' का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-'जुग जीतलें गे कानी' कि तभी लड़केवाले की तरफ से 'समस्यापूर्ति' हुई-'ई वर उठिहें त जानी'। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-'जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी'। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)
मेरा परिवार छोटे किसान का बड़ा संयुक्त परिवार था. परिवार में बाबा-मामा (दादा-दादी) समेत उनके तीन बेटों (एक निःसंतान) की संततियां थीं. खेत का रकबा कम होने से पूरे साल का धान-गेहूँ होना मुश्किल था. धान जैसे ही पककर तैयार होता कि उसका बोझा घर आना शुरू हो जाता. धान पीटने से लेकर उसको उसनने और ढेंकी में कूटने तक की जिम्मेवारी मां की हो जाती. करीब बीस लोगों का खाना बनाने के अतिरिक्त यह काम होता. देर रात को सोने के बावजूद चार बजे भोर में उठ जाना होता. गर्मी के दिनों में खास तौर से. तब गांवों में पेयजल-संकट के दिन थे. चापाकल बहुत कम प्रचलन में था. कुआं सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत था और समृद्धि का सूचक भी. गर्मी के दिनों में सुबह का उजाला होते-होते कुएं का पानी गंदला हो जाता. वैसे भी दिन में औरतों का घर की चहारदीवारी से बाहर निकलना व्यवहार में नहीं था. यह आजादी बूढ़ी हो चली औरतों को ही नसीब थी. एक चाचा को अपना दफ्तर (पटना) आना होता. छह बजे तक उनके लिए भोजन तैयार चाहिए था. ऐसे में जरूरी था कि माँ अपनी दिनचर्या की शुरुआत रात्रि के अंतिम प्रहर में करे.
तीसरी कक्षा तक स्कूल गई माँ अखबार में मोटे अक्षरों में छपी खबरों के शीर्षक पढ़ लेती थीं. जर्मनी, जापान की लड़ाई के किस्से सुनातीं. गांधीजी की 'अलौकिक' शक्ति में श्रद्धा थी. कहतीं, जब गांधीजी को अंग्रेज 'जेहल' में बन्द कर देते तो वे अपनी मर्जी से जब चाहते फाटक खोलकर बाहर निकल जाते.
मां बचपन में कहा करती थीं कि उनके गांव के एक चंद्रदेव शर्मा (जन्म : 5 मई, 1888) थे जिनका जहानाबाद में चाँद प्रेस था, और जिससे किताबें प्रकाशित होती थीं। फिलहाल कहना मुश्किल है कि यह चाँद, चंद्रदेव से आया था या रामरिख सहगल की 'चाँद' पत्रिका से. इतिहास की किताबों से मां की यह बात मैं अब तक पुष्ट न कर सका था, लेकिन टंडन जी की किताब में दर्ज पाया. डॉ. प्रेमनारायण टंडन ने दो खंड में हिन्दी-सेवी-संसार प्रकाशित की थी, प्रथम खंड का नाम बाद में हिन्दी-साहित्यकार-कोश हुआ. इसमें हिन्दी के कुल 2749 साहित्यकारों के बारे में संक्षिप्त किन्तु महत्त्वपूर्ण जानकारी दर्ज है. इसकी महत्ता का अंदाज आप इस बात से भी कर सकते हैं कि बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना ने 5 खंडों में हिन्दी साहित्य और बिहार प्रकाशित की है, उसमें भी जो बिहारी लेखक वर्णित नहीं हैं, यहां दर्ज हैं.
मां एक औसत भारतीय की तरह धार्मिक महिला थीं, लेकिन आडम्बर से दूर. मनुष्यता उनका धर्म रही. पूजा के नाम पर केवल तुलसी और पीपल में गुड़ और पानी डालते देखा. मेरे परिवार में कई लोग शाकाहारी थे तो कई विकट मांसाहारी. हमलोग मांस-मछली भी उसी चूल्हे पर बनाते जिस पर बाकी लोगों के लिए शाकाहारी खाना बनता. ग्रामीण जीवन का यह वो दौर था जब अन्यों के यहाँ मांसाहारी भोजन रसोईघर से दूर दरवाजे पर ही बनाने की अनुमति होती. मैं कभी माँ से पूछता कि अलग चूल्हे पर क्यों नहीं बनाती? चूल्हा अपवित्र हो जाएगा. माँ का जवाब होता-'बेटा, आग कभी अपवित्र नहीं होती. इसमें तो सबको पवित्र कर देने की ताकत है.' माँ अपने बचपन में एकाध बार मछली चखी थी. हमलोगों ने कभी खाते नहीं देखा, लेकिन उनमें इतना विवेक था कि उनके बेटे अगर किसी असाध्य बीमारी के शिकार होते और उसका इलाज गोमांस-भक्षण होता तो उसे भी उपलब्ध कराने में तनिक देर न करतीं. उनका यह विवेक मनुष्यता की गली से होकर आया था. उनसे हमने सीखा कि मनुष्य पहले नंबर का जीव है. जानवर, मनुष्य के लिए हैं न कि मनुष्य, जानवर के लिए. माँ ने मुझे मनुष्य बनना सिखाया.
पत्नी कहती हैं कि मां कभी सास की भूमिका में नहीं दिखीं, सदैव मां बनी रहीं। सम्भवतः दुनिया की पहली सास हैं जिन्हें बहू से मां का दर्जा प्राप्त है. माँ के न होने का गम मुझसे ज्यादा पत्नी को है. यह सब लिखते हुए मैं बेहद भावुक महसूस कर रहा हूँ, रोंगटे खड़े हो रहे हैं! मां के लिए लिखी कविता से अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं :
"मैंने कहा-दुख
और मां का चेहरा म्लान हो गया
शिथिल पड़ने लगीं देह की नसें
कहां रही ताकत
जवान गर्म खून की
दौड़ता फिरे जो
अश्वमेध के घोड़े-सा
मैंने कहा-मां
और उसकी आंखों में आंसू आ गए।" (आजकल, सितंबर 2007; आज समाज, दिल्ली, 8. 2. 2010)
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