Friday, September 25, 2026

मैं और मेरा प्रलेस

सन 84 में मैं पटना आया और बी. एन. कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ने लगा। पटना तब सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। अपने अग्रज मित्रों से और शहर की दीवारों पर लिखी इबारत से पटना में काम कर रहे छात्र संगठनों का एक मोटा मोटी अंदाजा हो चुका था। बड़े भाई के अत्यंत आत्मीय मित्र कथाकार हंसकुमार पांडेय जी की साहित्यिक चर्चाओं से यह मालूम हो चुका था कि पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के नाम से लेखकों का एक संगठन भी है। नाम के अलावा इस लेखक संगठन के बारे में कुछ न जानता था, लेकिन मैं मन ही मन अपने को इससे जुड़ा मानता था।हंसकुमार पांडेय की प्रगतिशील लेखक संघ वाली इन चर्चाओं में नंदकिशोर नवल, अरुण कमल, तरुण कुमार, कवि शील, 'धरातल' पत्रिका वाले मघड़ावासी अयोध्यानाथ सांडिल्य और अपूर्वानंद हमेशा मौजूद रहते। 

सन् 87 की बात है। 'जनशक्ति' में इन्द्रकांत मिश्र थे। बातचीत के क्रम में मैं उन्हें पसंद आ गया और मुझे बेहिचक हू-ब-हू छापने लगे। यहाँ तक कि शीर्षक बदलने के ‘मौलिक अधिकार’ तक का भी वे इस्तेमाल न करते। मुझे छापते और कहते-‘तुम आग लिखते हो’। वे छापते गये क्योंकि संपादक से अधिक एक ‘विद्रोही व्यक्ति’ हो गये थे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया में निष्ठापूर्वक काम करते हुए निजी जीवन में उन्होंने जो ‘असफलता’ हासिल की थी, उससे उनके तेवर बदल गये थे। जनशक्ति से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। बात सन् 89 की है। नंदकिशोर नवल उन दिनों इस अखबार में नियमित लिख रहे थे। संभवतः साहित्य पृष्ठ पर ‘वातायन’ कालम में। नवल जी को मैं आदर के साथ पढ़ता था। शायद उससे पहले ही कम्युनिस्ट पत्रिका में मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र (हू-ब-हू शीर्षक याद नहीं) पर छपा उनका लेख पढ़ चुका था और मैं उसकी गिरफ्त में था। घटना है कि हंस में गिरिराज किशोर की एक छोटी-सी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी ‘प्रेमचंद की तरह लिखना आसान है जैनेन्द्र की तरह मुश्किल’। इसे पढ़कर मैं तिलमिला गया था। यह नहीं कि जैनेन्द्र को मैं छोटा लेखक मानता था, बल्कि प्रेमचंद के संदर्भ में कही गई बात मेरे मार्क्सवादी दिल (कुछ मित्र ‘मार्क्सवाद  में दिल’! पर कानाफूसी करेंगे) को लग गई। इसी समय नवल जी एवं अपूर्वानंद का लेख जनशक्ति में छपा। मजेदार बात यह थी कि नवल जी का लेख ऊपर के आधे हिस्से में छपा था और नीचे के बाकी बचे हिस्से में अपूर्वानंद द्वारा अनूदित रूसी कवियों की कविताएँ थीं। उन दिनों हिन्दी, एम. ए. में पढ़ रहे अमरेन्द्र कुमार मेरे साथ रहते थे। मैंने कहा, ‘अमरेन्दु जी (निकट से जाननेवाले लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते थे) हिन्दी साहित्य में तो एक नये टॅापिक की शुरुआत हो गई-‘ससुर-जामाता प्रसंग।’ यह स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। इसका विरोध होना चाहिए। उन्होंने पूछा, ‘लेकिन  कैसे ?’ ‘ऐसा कीजिए कि हम दोनों ही लेख लिखते हैं और उसे ठीक इसी तरह ऊपर-नीचे छपाया जायेगा’-मैंने कहा। पहले-तो उन्होंने साफ इनकार किया। लिखने ही को राजी न हुए। बोले, ‘दोनों मेरे शिक्षक हैं (अपूर्वानंद उन दिनों हिन्दी विभाग में जे. आर. एफ. थे; अतएव पढ़ाया भी करते थे), रोज कक्षा में देखा-देखी (टोका-टोकी) होगी, इसलिए कुछ ठीक नहीं लगता।’ मैंने प्रतिबद्धता और ईमानदारी की प्रत्यंचा चढ़ाई। कहा-‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?’ लेकिन टस से मस न हुए। फिर मैंने कहा, ‘अच्छा ऐसा कीजिए कि आप कोई बिल्कुल ही ‘अहिंसक’ प्रकृति का लेख लिख डालिए। बाकी मैं देख लूँगा।’ अब मामला तय हो चुका था। हम दोनां सड़क पर आये। मुझे सिगरेट की लत थी। अमरेन्दु जी ने ‘गुलाब छाप’ गुल का डिब्बा लिया। कमरे में आकर दोनों शांतचित्त एवं दŸाचिŸा हो हाथ में कलम पकड़ बैठ गये। चेहरे पर जो तनाव था वह बता रहा था कि हमलोग ‘शत्रु-दल’ के व्यूह में प्रवेश कर चुके हैं। लगभग आध घंटे के परिश्रम से मैंने लेख तैयार कर डाला। शीर्षक लगाया-‘आलोचना की राजनीति’ (प्रकाशन तिथि : 25 फरवरी, 1989)। और काफी गुल फाँक चुकने के बाद अमरेन्दु जी ने लिखा ‘सूनी बावड़ी में लाल कन्हेर फूलों की महक।’ दोनों ही लेख मैंने इन्द्रकांत मिश्र को थमा दिये। साहित्य के अगले अंक में ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे हम दोनां ही के लेख छपे। अलबत्ता ‘वातायन’ कॉलम की जगह छपा ‘वातायन पर दस्तक’। इस हालत में लेख छपा पाकर मैं रोमांचित हो उठा। ‘साहित्य के मठ’ पर यह मेरा पहला ‘हमला’ था।

इस घटना के कुछ दिनों बाद मैं अमरेन्दु जी व दीपक कुमार गुप्ता (तब वे भी हिन्दी, एम. ए. के छात्र थे) के साथ दरभंगा हाउस गया। वे दोनों तो अपने वर्ग में चले गये। मैं वहीं सायकिल स्टैंड में बैठा राजेन्द्र जी (सायकिल स्टैंड के कर्मचारी) से बातें करता हुआ इंतजार करने लगा। एक-आध घंटे बाद वे दोनों आए और मुझसे कहने लगे, ‘यहाँ अकेले बैठे क्या कीजिएगा। नवल जी का ‘‘निराला स्पेशल’’ है इसलिए चलिए आप भी वहीं बैठिएगा।’ मैंने कहा, मुझ ‘बाहरी ’ आदमी को कहाँ ले जाइएगा, नवल जी को अच्छा नहीं लगेगा। वैसे नवल जी से मैं पहले कभी व्यक्तिगत रूप से मिला न था लेकिन मेरा उनके बारे में अब तक का ‘संचित ज्ञान’ था कि वे गुस्सैल हैं और बातचीत में अक्सर उग्र हो जाया करते हैं। शायद हंस कुमार पाण्डेय से कभी सुन रखा था कि ‘नयी पीढ़ी’ पत्रिका के नरेन्द्र से बात करते हुए वे काफी उत्तेजित हो गये थे। इसलिए मैं जाने से परहेज कर रहा था। अंततः मै गया। वर्ग में नवल जी आए। ‘निराला स्पेशल’ में तीन ही छात्र थे, इसलिए मुझ चौथे को ‘ट्रेस’ अथवा ‘लोकेट’ करते उन्हें तनिक देर न लगी। उन्हांने बैठते ही शक की निगाहों से मुझे देखा और पूछा ‘ये महाशय कौन हैं ?’ अमरेन्दु जी ने बताया कि आप राजू रंजन प्रसाद हैं और इतिहास, एम. ए. में दाखिला लेनेवाले हैं। लिखने-पढ़ने में भी रुचि है और फिलहाल आपको सुनने आए हैं। मेरा नाम सुनना था कि उनके रंग-तेवर बदल गये। लगा जैसे कोई 'अशुभ' सपना देख लिया हो! उनका धैर्य टूट चुका था। बोले, ‘आपही ने जनशक्ति में लेख लिखा है ?’ मैंने ‘जी हाँ’ कहा। फिर क्या था। वे टेपरिकार्डर की तरह चालू हो गये-‘मैंने तो समझा था कि आप कोई बुजुर्ग होंगे लेकिन आपको तो अभी कलम पकड़ने तक की भी तमीज नहीं है। टोह लेते हुए बोले, ‘आप यहाँ किन-किन लोगों से मिलते-जुलते हैं ? खगेन्द्र ठाकुर को जानते हैं आप ?’ ‘केवल नाम से जानता हूँ। व्यक्तिगत रूप से मिला नहीं हूं’-मैंने कहा। ‘क्या आप एम. एल. (माले) में हैं ?’ ‘नहीं तो’ मेरा स्पष्ट जवाब था। कोई सुराग न मिलने पर उन्होंने पुनः पूछा ‘तो फिर आप किसके साथ उठते-बैठते, मिलते-जुलते हैं ?’ उत्तर में मैंने रामशरण शर्मा का नाम लिया था। सही है कि उन दिनों मैं उनके पास आया-जाया करता था। कई बार अमरेन्दु जी भी साथ होते। उन दिनों की शर्मा जी के साथ हमलोगों की तीन-चार तस्वीरें भी हैं। जनशक्ति में मेरे उक्त लेख का यह असर भी हुआ कि नवल जी ने उसमें लिखना बंद कर दिया। शायद हमेशा के लिए।

'जनशक्ति' के बाद 'हिन्दुस्तान' का दौर आरंभ होता है। दरअसल उन दिनों मैं सुलभ जी के नियमित संपर्क में बना रहता था। एक दिन उन्होंने 'हिन्दुस्तान' के नागेन्द्र जी से मिलाया। वे स्वभाव से उदार और मिलनसार थे। नागेन्द्र मुझसे सांस्कृतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग कराने लगे। मुझे भी अच्छा लगने लगा। गोष्ठियों में तो जाया ही करता था अब उसकी रिपोर्टिंग कर देने से कुछ पैसे भी मिलने लगे थे। एक छात्र को इससे ज्यादा भला और क्या चाहिए था ! मैं काफी खुश था। इन्हीं दिनों प्रगतिशील लेखक संघ, पटना ने एक गोष्ठी आयोजित की जिसका विषय था ‘मार्क्सवादी इतिहास लेखन के अतिरेक।’ इसके मुख्य वक्ता राम शरण शर्मा थे। अपूर्वानंद के आग्रह पर मेरे बड़े भाई अखिलेश कुमार ने भी अपने विचार रखे। और फिर मुझे भी कुछ कुछ बोलने का मौका मिला था। कुल मिलाकर इस गोष्ठी में तीन ही वक्ता थे। मैंने जो रिपोर्टिंग की थी या जो छपी उसमें उक्त तीनों नाम थे। इस रपट से नवल जी खासे नाराज हुए थे। उन्होंने मुझ पर भाई-भतीजावाद करने का आरोप भी लगाया था। सफाई में मैंने नवल जी को इतना ही कहा था कि ‘मैंने तथ्य की रिपोर्टिंग की है। तीन वक्ता थे और तीनों के नाम दर्ज हैं, इसलिए कहीं कोई गड़बड़ी नहीं है।’ वे मुझसे असंतुष्ट थे ही इसलिए हिन्दुस्तान के संपादक को मेरी भर्त्सना (लगभग गाली) करते हुए संपादक को पत्र तक लिख डाला।

1985 में प्रगतिशील लेखक संघ, पटना की ओर से 'धारा' नाम से एक बुलेटिन जारी हुई थी जिसमें अपूर्वानंद जी का चर्चित और विवादास्पद लेख 'नागार्जुन की राजनीति' छापा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि इस लेख में नागार्जुन को सोवियत-विरोधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विरोधी साबित किया गया था। बौद्धिक जगत में इस लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी। 

खगेन्द्र ठाकुर ने उसके लेखक और भूमिका लेखक (बाद में ससुर-दामाद) दोनों को निजी तौर पर बता दिया था कि यह लेख उचित नहीं है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने भी अपने को उससे अलग बताया। इस विवाद में भीष्म साहनी जी ने एक पत्र लिखा और स्पष्ट कहा कि लेखक को लिखने की आजादी है, लेकिन उसे प्रगतिशील लेखक संघ से नहीं छापना चाहिए था। (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 92)

उसके कुछ दिनों के बाद जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन हुआ। नामवर जी उद्घाटन करने पहुंचे थे। जब नामवर जी जमशेदपुर पहुँच गये, तो उनसे मिलने खगेन्द्र ठाकुर होटल में गये। मिलते ही उन्होंने पूछा, 'खगेन जी यह सब क्या हो रहा है?' खगेन्द्र जी ने पहले समझा नहीं, इसलिए पूछा, क्या हो रहा है? अरे यह 'नागार्जुन की राजनीति' का मामला! "ओह, वह, मैंने भी छपने पर उसे देखा और पढ़ा।" "ऐसा है?" खगेन्द्र जी ने कहा, "जी हां"। वे बोले, "समझ गया"। नामवर जी को अध्यक्षीय भाषण करना था। उन्होंने समकालीन कविता और उसके मूल्यांकन की समस्या पर बोलते हुए उग्र स्वर में कहा, "आज नागार्जुन की राजनीति पर संदेह किया जा रहा है, उन पर प्रश्न उठाया जा रहा है। मुझे भी कुछ लोगों ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से संशोधनवादी घोषित कर रखा है। लेकिन मैं जो काम तब कर रहा था, वही आज भी कर रहा हूँ। कुछ लोग लगे हैं प्रगतिशील लेखक संघ को झाड़ू से बुहारकर साफ कर देने को, गोया यह लेखक संघ न हुआ मेहतरों का संघ हो गया। ...हमारे बीच कुछ लोग हैं जिनके हाथ में खून की प्यासी तलवार है, उन्हें जब दुश्मन नहीं मिलता तो अपने घर में ही तलवार भांजने लगते हैं।" (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 116-17) 

अपनी 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में नवल जी ने विस्तार से बताया कि एक दौर में पार्टी के साथ बाबा नागार्जुन के तीखे अनबन के कारण प्रगतिशील लेखक संघ के खिलाफ एक पुस्तिका लिखने के लिए उन्हें उकसाया गया था। उन्होंने अपनी भूमिका के साथ बाबा के खिलाफ एक पुस्तिका अपूर्वानंद से लिखवाई। पुस्तिका छपने के बाद खगेन्द्र जी, अरुण कमल ने तो इसके पीछे अपना हाथ होने से इंकार कर दिया और उस पुस्तिका को लेकर चारों तरफ से हो रही तीव्र निंदा के चलते अपूर्वानंद तथा उन पर प्रलेस से निकालने की कार्रवाई हो गई। बाबा तो ऐसे बमके कि एकदम से राजकमल प्रकाशन की संचालिका शीला संधु के यहाँ जा धमके। शीला जी से उन्होंने दो टूक शब्दों में 'आलोचना' से नवल और नामवर दोनों को तत्काल निकालने की बात कही। शीला जी ने नवल जी को तो निकाल दिया लेकिन नामवर जी को निकालना उनके बूते की बात नहीं थी। परंतु बाबा अपनी जिद पर डटे रहे। फलतः नामवर जी को निकालने की जगह शीला जी को 'आलोचना' के प्रकाशन को ही कुछ समय के लिए स्थगित कर देना पड़ा। (सुमन्त, 'जनशक्ति', पटना, 10-16 फरवरी, 2013)

No comments:

Post a Comment