Friday, September 25, 2026

अजय कुमार : वे हमारे गाँव के गांधी थे (1/8/53-23/8/96)

कुरता-धोती, पैण्ट-शर्ट और चमड़े के काले पॉलिश वाले जूते में बायीं छाती से किताब लगाए बिल्कुल एक सीध में बढ़ते जा रहे आदमी की जो छवि मेरे जेहन में कैद है, वे अजय कुमार हैं। अपने बचपन में यही रूप देखा था उनका। वे कहाँ आते-जाते थे, तब नहीं पता था। जब थोड़ा बड़ा हुआ और उनके किस्से-कहानियों से मालूम हुआ कि वे मगध विश्वविद्यालय, बोधगया में अर्थशास्त्र विषय से एम. ए. कर रहे थे। मेरे बड़े भाई जब पटना से घर आते तो दोनों की बैठकी लगती। दोनों की बातचीत से जानकारी के सोते फूटते।

यों जन्म तो उनका जहानाबाद के कसवां गाँव में हुआ था किंतु उनका पालना मेरा गाँव तिनेरी ही बना था। तिनेरी में उनका नानीघर था। नाना सत्यनारायण सिंह थे जिनकी असमय मृत्यु ग्रामीण और पड़ोसी बाबू  बिंदा सिंह के कुएं से बालू निकालते हो गई थी। दो अन्य लोग भी इस हादसे के शिकार हुए थे। सब के सब जवान थे। बड़ी त्रासद घटना थी यह। सत्यनारायण सिंह के बूढ़े पिता कीरित सिंह जीवित थे। और घर में उनकी विधवा पतोहू थी। सारा गाँव उन्हें गनियारी चाची या मामा कहता। मेरी तो चाची ही लगतीं। गनियारी गांव की थी। तब औरतों को उनका अपना नाम नहीं मिला था। गांव के नाम से पुकारी जाती थी।

कीरित सिंह की कीर्ति दूर-दूर के गांवों में फैली हुई थी। कोई नया पुलिस-दरोगा आता तो उनको अपना सलाम ठोक जाता। लोग जानते थे कि जिन पर उनकी वक्रदृष्टि पड़ गई, उनकी खैर नहीं। कभी-कभी तो खाट पर सोए लोग राता-राती खाट समेत उनकी सेवा में उपस्थित हो जाते थे।

कीरित बाबा के किस्से गाँव की हवा में तैरते थे। बाबूजी बताया करते थे कि कीरित का जब बूढ़े हो चले और शिवनन्दन शर्मा (शील जी) की जवानी चढ़ रही थी तो एक दिन किसी ने थोड़ी हवा दे दी। बस शील जी ने मुड़घौंस मार दिया। 'जवानी में शूकरी सुंदर तो लग सकती है, बकरी, हथिनी नहीं हो सकती।' बूढ़े पहलवान ने दोनों घुटनों से शील जी का सिर दबा दिया। शील जी की आंखें बाहर निकलने ही वाली थीं कि पास खड़े दारोगा सिंह ने मुक्ति दिलवा दी।

उन कीरित बाबा के अंतिम दिनों की हल्की स्मृति ही मेरे पास है। जब वे अपने मृत्युशय्या पर लेटे थे। उसकी कोई साफ तस्वीर तो नहीं है किंतु निगेटिव जैसी एक धुंधली छाया मन में बसी है। उनके निधन के बाद एक सांढ़ गोल दागकर छोड़ा गया था। मेरे गांव के किसी मृतक के लिए यह अंतिम छोड़ा गया सांढ़ था। मृतक की स्मृति का अंतिम चिन्ह उनका मुगदर था जिसे हमलोग उठाने की कोशिश करते और बार-बार असफल होते। लगभग डेढ़ मन का मुगदर उठाकर अपनी जवानी में वे भांजा करते थे। आज उनके इस मुगदर से उनके पराक्रम का अंदाजा होता है।

अजय कुमार इस पुरुषहीन परिवार के सबसे बड़े नाती थे। अपनी शिक्षा के साथ खेती-गृहस्थी का सारा दारोमदार उन्हीं पर था। वे सरल, सहज और स्वाभिमानी थे। सादगी इतनी कि वे हमारे गाँव के गाँधी थे। थे भी गांधी के अनन्य भक्त। गाँधी को लेकर अक्सर मेरी उनसे बहस हो जाती। यद्यपि मैं उम्र में उनसे काफी छोटा था लेकिन गांव के रिश्ते में उनका मामू (मामा) था इसलिए काफी सम्मान से पेश आते। वैसे भी शिष्टता उनका भूषण थी। बहस में उन्होंने भागना नहीं सीखा था, प्रतिद्वंद्वी के समक्ष अंगद के पांव की तरह टिके रहते। 

बातचीत के क्रम में कुछ नाम अक्सर आते। कसवां के लाला बाबू और वागीश बाबू अवश्य होते। लक्ष्मी पुस्तकालय, पटना के परमेश्वरी बाबू के बारे में पहली बार उन्हीं से जाना था कि गरीब (भूमिहार) विद्यार्थियों की मदद करने में वे कोई कसर नहीं छोड़ते। एस. एस. कॉलेज, जहानाबाद के प्राचार्य श्री रघुवंश प्रसाद सिंह का नाम तो बस उनकी जिह्वा पर ही होता। प्राचार्य की ईमानदारी से वे बहुत प्रभावित थे और बुरी तरह से खिंचे महसूस करते थे। उनके पास उक्त कॉलेज में पढ़नेवाले लड़कों की भीड़ होती। सब निर्धन बच्चों को कॉलेज की ओर से मिलने वाली छूट का लाभ लेना होता। इस भीड़ में हर जाति के गरीब होते। भूमिहार लड़के होते तो मुसहर जाति से आनेवाले रामाश्रय जी भी होते। सहज आत्मीयता के अतिरिक्त कोई और संवेदना से वे कतई निर्देशित न थे।

हाई स्कूल में दीनबंधु प्रसाद सिंह 'दीन' मेरे शिक्षक थे। वे भूगोल के शिक्षक थे। अंग्रेजी और अर्थशास्त्र भी पढ़ाया करते। अंग्रेजी आठवीं तक तथा अर्थशास्त्र दसवीं तक पढ़ाते। अर्थशास्त्र की पढ़ाई उन्होंने बी. ए. स्तर तक की थी। जब मैं दसवीं में गया तो उन्होंने एम. ए. करने की सोची। उन्होंने कहीं से नोट्स ऊपर कर रखे थे। उसकी नकल के लिए मुझे दे रखा था। वे वर्ग में अर्थशास्त्र विषय में जो कुछ पढ़ाते मैं उसकी चर्चा पड़ोस के अजय जी से करता। अजय जी से अन्य विषयों पर भी मेरी घंटों की लंबी बातचीत होती। उनके पास जब मैं अपना पक्ष रखता तो वे अक्सर मेरे तर्क से सहमत होते और कई तरह की किताबों के साथ दीनबन्धु बाबू के सम्मुख उपस्थित हो जाते। दोनों में घंटों वाक्युद्ध चलता और मैं 'तृप्त' होता।



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