Tuesday, August 31, 2010

आलोचक का भूत

मदन कश्यप
‘समन्वय’(पटना की युवा संस्था जो अब मृतप्राय है ) के निर्माण के दिनों में ही ‘उस देश  की कथा’ के कवि पंकज कुमार चौधरी से कुमार मुकुल की शिरकत से परिचय हुआ था। पंकज जी ने अपनी ताजा प्रकाशित रचना पढ़ने हेतु मुझे भेंट भी की थी। मित्र की किताब मैंने चाव से पढ़ी और अपनी आदत के विपरीत, एक तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में लगभग सात पृष्ठों की समीक्षा भी लिख डाली। हालांकि प्रतिक्रिया कुछ तीखी हो चली थी। ‘समन्वय’ में एक छोटी-सी गोष्ठी आयोजित हुई जिसमें मैंने इसका कवि की मौजूदगी में पाठ भी किया। यहां यह कहना आवश्यक-सा लग रहा है कि इस लेख का वाचन सुनते हुए पंकज जी कभी असहज नहीं हुए। (बाद में भी कभी इसका ‘कुप्रभाव’ न दिखा। उनके इस व्यवहार से मैं काफी प्रभावित हूं।)  इसके काफी दिनों बाद जब डा. विनय कुमारसमकालीन कविता’ का पहला अंक निकाल चुके तो इस लेख की फोटो कापी मैंने उन्हें पढ़ाई। लेख ‘आक्रामक’ होने के बावजूद उन्हें पसंद आया। कुछ दिनों बाद जब उनसे संपर्क साधा तो वे बोले, ‘लेकिन मैं इसे प्रकाशित नहीं कर सकता।’ मेरे ‘क्यों ?’ के जवाब में उन्होंने कहा कि ‘अव्वल तो इसमें खगेन्द्र ठाकुर की आलोचना है, और फिर मदन कश्यप को यह पसंद नहीं है कि एक ‘नये कवि’ को सात-सात पृष्ठों में छापा जाये।मदन जी को शायद कवि से ज्यादा ‘आलोचक का भूत’ सता रहा था। रही बात खगेन्द्र जी की, तो जहां तक मैंने समझा है, अपनी आलोचना को वे अतिरिक्त महत्त्व नहीं देते।

Monday, August 30, 2010

और वह सड़क समझौता बन गयी

अनिल विभाकर
उन्हीं दिनों नवल जी की पुस्तक ‘कविता की मुक्ति’ हाथ लगी। उससे पहले ‘हिन्दी आलोचना का विकास’ पढ़ चुका था। ‘कविता की मुक्ति’ पढ़ते-पढ़ते धूमिल पर लिखने की मेरी इच्छा हुई। मैंने एक लेख लिखा भी। हाल ही में  परिचित बने युवा आलोचक भृगुनन्दन त्रिपाठी ने उसे माँगकर देखा। कहना होगा कि भृगुनन्दन त्रिपाठी नये लड़कों को तरजीह देते थे अथवा यों कहें कि उनके लिए वे सुलभ बने रहने की भरसक कोशिश करते थे। पटने की साहित्यिक संस्कृति में तब नवल जी का ‘विरोधी’ होना भी ध्यानाकर्षण का कारण होता था। खैर, त्रिपाठी जी ने मेरा लेख पढ़कर कहा, ‘राजू जी, आपका लेख पढ़ते हुए ऐसा लग रहा है मानो नेमिचन्द्र जैन को पढ़ रहा हूँ।’ मेरे पल्ले बात कुछ पड़ी नहीं क्योंकि एक तो नेमिचन्द्र को मैंने पढ़ा नहीं था और दूसरे मेरे दिमाग में उनकी छवि नाटक की दुनिया के एक आदमी की बन चुकी थी। फिर भी मैं अपनी तुलना नेमिचन्द्र जैन से होते देखकर फूले न समा रहा था। त्रिपाठी जी एवं कर्मेन्दु शिशिर (तब दोनों में काफी आत्मीयता थी। रहते भी आस-पास ही थे।) दोनों ही ने मेरे इस लेख को ‘साक्षात्कार’  में छपवाने की बात कही। इसी बीच ‘साक्षात्कार’ के संपादक हरि भटनागर किसी सिलसिले में पटना आये और उनका कहानी-पाठ भी आयोजित हुआ। शायद भीड़-भाड़ या किसी और सम्भव कारण से मेरा यह लेख भटनागर जी को देना सम्भव न हो सका। कई दिनों के बाद जब मैंने फिर चर्चा की तो त्रिपाठी जी ने कहा, ‘राजू जी, दरअसल उस लेख में इतिहास प्रधान हो गया है और साहित्य गवाक्ष होकर रह गया है ।’ मुझ जैसे इतिहास के विद्यार्थी पर साहित्य का ‘गवाक्ष’ भारी पड़ गया और उसके बाद से मैं अपने ही राजमार्ग पर निर्भय हो चलने लगा।

धूमिल वाले लेख को लेकर मैं दैनिक हिन्दुस्तान के दफ्तर पहुंचा । हिन्दुस्तान  में साहित्य का एक पेज निकलता था जिसका संपादन अनिल विभाकर करते थे। वे मेरा लेख देखकर थोड़ा मुस्कराए और बोले ‘इन लोगों को जहां जाना था वहां पहुंच चुके। अब लिखने से क्या होगा।’ मुझे यह बात समझ में न आई। कई बार उन्हें अपने लेख की याद दिलाई लकिन अपने इरादे से हिल न रहे थे। इनकी कही बात का गूढ़ार्थ अब जाकर कुछ-कुछ खुलने लगा था। मुझे एक तरकीब सूझी। उसका इस्तेमाल करने में कोई दोश न दिखा। दरअसल मेरे पास रेडियो से समीक्षा हेतु प्रदत्त पुस्तक ‘शहर से गुजरते हुए’ पड़ी थी। उस संग्रह में उनकी भी एक कविता थी। एक दिन मैंने चर्चा के दौरान कहा कि बहरहाल ‘शहर से गुजरते हुए’ की समीक्षा रेडियो के लिए लिख रहा हूं। उसमें आपकी भी एक कविता है। बडी ही निर्दोष कविता है, अच्छी है। फिर क्या था। उनका दिल कविता की उष्मा से हिमनद की तरह पिघलने लगा। अपने खास अंदाज में बिहंसते हुए बोले, ‘आपका लेख ब्रोमाइड करके काफी दिनों से रखा हुआ है। इस हफ्ते निकल जायेगा।’ वाकई अब लेख प्रकाशित था। शीर्षक था ‘और वह सड़क समझौता बन गयी’ (प्रकाशन तिथिः 8 नवंबर’ 93)।


Saturday, August 28, 2010

अखबार में यह सब चलता है

जनशक्ति के बाद हिन्दुस्तान का दौर आरंभ होता है। दरअसल उन दिनों मैं सुलभ जी के नियमित संपर्क में बना रहता था। एक दिन उन्होंने हिन्दुस्तान के नागेन्द्र जी से मिलाया। वे स्वभाव से उदार और मिलनसार थे। नागेन्द्र मुझसे सांस्कृतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग कराने लगे। मुझे भी अच्छा लगने लगा। गोष्ठियों में तो जाया ही करता था अब उसकी रिपोर्टिंग कर देने से कुछ पैसे भी मिलने लगे थे। एक छात्र को इससे ज्यादा भला और क्या चाहिए था ! मैं काफी खुश था। इन्हीं दिनों प्रगतिशील लेखक संघ, पटना ने एक गोष्ठी आयोजित की जिसका विषय था ‘मार्क्सवादी इतिहास लेखन के अतिरेक।’ इसके मुख्य वक्ता रामशरण शर्मा थे। अपूर्वानंद के आग्रह पर मेरे बड़े भाई अखिलेश कुमार ने भी अपने विचार रखे। और फिर मुझे भी कुछ कुछ बोलने का मौका मिला था। कुल मिलाकर इस गोष्ठी में तीन ही वक्ता थे। मैंने जो रिपोर्टिंग की थी या जो छपी उसमें उक्त तीनों नाम थे। इस रपट से नवल जी खासे नाराज हुए थे। उन्होंने मुझ पर भाई-भतीजावाद करने का आरोप भी लगाया था। सफाई में मैंने नवल जी को इतना ही कहा था कि ‘मैंने तथ्य की रिपोर्टिंग की है। तीन वक्ता थे और तीनों के नाम दर्ज हैं, इसलिए कहीं कोई गड़बड़ी नहीं है।’ वे मुझसे असंतुष्ट थे ही इसलिए हिन्दुस्तान के संपादक को मेरी भर्त्सना (लगभग गाली) करते हुए पत्र लिख डाला। उक्त पत्र को दिखाते हुए नागेन्द्र ने कहा था -‘देखो, बिहार में कैसे-कैसे लोग (हालाँकि उन्होंने अपशब्द का प्रयोग किया था) होते हैं।’ मैं बेहद शर्मिंदा था।

सम्भवतः इसी साल अर्थात् सन् 91 में आकाशवाणी, पटना की तरफ से एक काव्य-संध्या आयोजित की गई थी जिसमें केदारनाथ सिंह समेत देश के कोने-कोने से हिन्दी के कवि पधारे थे। चूँकि साहित्य, और विशेषकर कविता से मेरा खास अनुराग (कभी-कभी डा. विजय कुमार ठाकुर मेरे साहित्य-प्रेम को देखते हुए हिन्दी, एम. ए. मे दाखिला ले लेने तक की बात तक कह डालते थे। वे अक्सर कहते कि तुम बेकार इतिहास में आ गये हो, तुम्हें तो हिन्दी विभाग में होना चाहिए था।) था, इसलिए इसकी रिपोर्टिंग के लिए मैंने विशेष तैयारी कर रखी थी। साथ ही यह भी अनुमान लगा रहा था कि यह ‘पीस’ कई कॉलमों में छपेगा और इसके अच्छे पैसे बनेंगे। मैंने अपनी तरफ से कोई कमी न छोड़ी थी। किन्तु जब छपने की बारी आयी तो नागेन्द्र जी ने बताया कि सम्पादक का उन पर दबाव है कि उक्त काव्य-गोष्ठी की रिपोर्टिंग वे खुद करें। इसलिए सम्भवतः नौकरी के दबाव में रिपोर्टिंग उन्हें अपने नाम करनी पड़ी। हालाँकि उन्होंने कह रखा था कि ‘राजू , बुरा मत मानना, अखबार में यह सब चलता है।’ अलबत्ता, मुझे मेरे नाम से न छपने के साथ-साथ पैसे न मिलने का भी दुःख था। यह सच है कि हिन्दुस्तान में रिपोर्टिंग मैंने पैसे को ध्यान में रखकर ही शुरू की थी। पत्रकारिता के ‘ग्लैमर’ को लेकर मैंने जो कुछ सोचना शुरू किया था उसको एक झटका लगा। इस घटना के बाद मुझे लगने लगा कि लिखने-पढ़नेवाले लोगों के लिए कम से कम अखबार की नौकरी से परहेज करना चाहिए।

Tuesday, August 24, 2010

और नवल जी ने लिखना बंद कर दिया

रामशरण शर्मा
इस घटना के कुछ दिनों बाद मैं अमरेन्दु जीदीपक कुमार गुप्ता (तब वे भी हिन्दी, एम. ए. के छात्र थे) के साथ दरभंगा हाउस गया। वे दोनों  तो अपने वर्ग में चले गये। मैं वहीं सायकिल स्टैंड में बैठा राजेन्द्र जी (सायकिल स्टैंड के कर्मचारी) से बातें  करता हुआ इंतजार करने लगा। एक-आध घंटे बाद वे दोनों आए और मुझसे कहने लगे, ‘यहाँ अकेले बैठे क्या कीजिएगा। नवल जी का ‘‘निराला स्पेशल’’ है इसलिए चलिए आप भी वहीं बैठिएगा।’ मैंने कहा, मुझ ‘बाहरी ’ आदमी को कहाँ ले जाइएगा, नवल जी को अच्छा नहीं लगेगा। वैसे नवल जी से मैं पहले कभी व्यक्तिगत रूप से मिला न था लेकिन मेरा उनके बारे में अब तक का ‘संचित ज्ञान’ था कि वे गुस्सैल हैं और बातचीत में अक्सर उग्र हो जाया करते हैं। शायद हंस कुमार पाण्डेय से कभी सुन रखा था कि ‘नयी पीढ़ी’  पत्रिका के नरेन्द्र से बात करते हुए वे काफी उत्तेजित हो गये थे। इसलिए मैं जाने से परहेज कर रहा था। अंततः मै गया। वर्ग में नवल जी आए। ‘निराला स्पेशल’ में तीन ही छात्र थे, इसलिए मुझ चौथे को ‘ट्रेस’ अथवा ‘लोकेट’ करते उन्हें तनिक देर न लगी। उन्होंने  बैठते ही शक की निगाहों से मुझे देखा और पूछा ‘ये महाशय कौन हैं ?’ अमरेन्दु जी ने बताया कि आप राजू रंजन प्रसाद हैं और इतिहास, एम. ए. में दाखिला लेनेवाले हैं। लिखने-पढ़ने में भी रुचि है और फिलहाल आपको सुनने आए हैं। मेरा नाम सुनना था कि उनके रंग-तेवर बदल गये। लगा जैसे कोई अशुभ सपना देख लिया हो! उनका धैर्य टूट चुका था। बोले, ‘आपही ने जनशक्ति में लेख लिखा है ?’ मैंने ‘जी हाँ’ कहा। फिर क्या था। वे टेपरिकार्डर की तरह चालू हो गये-‘मैंने तो समझा था कि आप कोई बुजुर्ग होंगे लेकिन आपको तो अभी कलम पकड़ने तक की भी तमीज नहीं है। टोह लेते हुए बोले, ‘आप यहाँ किन-किन लोगों से मिलते-जुलते हैं ? खगेन्द्र ठाकुर को जानते हैं आप ?’ ‘केवल नाम से जानता हूँ। व्यक्तिगत रूप से मिला नहीं हूं’-मैंने कहा। ‘क्या आप एम. एल. (माले) में हैं ?’ ‘नहीं तो’ मेरा स्पष्ट जवाब था। कोई सुराग न मिलने पर उन्होंने पुनः पूछा ‘तो फिर आप किसके साथ उठते-बैठते, मिलते-जुलते हैं ?’ उत्तर में मैंने रामशरण शर्मा का नाम लिया था। सही है कि उन दिनों मैं उनके पास आया-जाया करता था। कई बार अमरेन्दु जी भी साथ होते। उन दिनों की शर्मा जी के साथ हमलोगों की तीन-चार तस्वीरें भी हैं। जनशक्ति में मेरे उक्त लेख का यह असर भी हुआ कि नवल जी ने उसमें लिखना बंद कर दिया। शायद हमेशा के लिए।

Friday, August 20, 2010

वातायन पर दस्तक

नंदकिशोर नवल
जनशक्ति से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। बात सन् 89 की है। नंदकिशोर नवल उन दिनों इस अखबार में नियमित लिख रहे थे। संभवतः साहित्य पृष्ठ पर ‘वातायन’ कालम में। नवल जी को मैं आदर के साथ पढ़ता था। शायद उससे पहले ही कम्युनिस्ट पत्रिका में मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र (हू-ब-हू शीर्षक याद नहीं) पर छपा उनका लेख पढ़ चुका था और मैं उसकी गिरफ्त में था। घटना यह है कि हंस में गिरिराज किशोर की एक छोटी-सी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी ‘प्रेमचंद की तरह लिखना आसान है जैनेन्द्र की तरह मुश्किल’। इसे पढ़कर मैं तिलमिला गया था। यह नहीं कि जैनेन्द्र को मैं छोटा लेखक मानता था, बल्कि प्रेमचंद के संदर्भ में कही गई बात मेरे मार्क्सवादी दिल (कुछ मित्र ‘मार्क्सवाद  में दिल’! पर कानाफूसी करेंगे) को लग गई। इसी समय नवल जी एवं अपूर्वानंद का लेख जनशक्ति में छपा। मजेदार बात यह थी कि नवल जी का लेख ऊपर के आधे हिस्से में छपा था और नीचे के बाकी बचे हिस्से में अपूर्वानंद द्वारा अनूदित रूसी कवियों की कविताएँ थीं। उन दिनों हिन्दी, एम. ए. में पढ़ रहे अमरेन्द्र कुमार मेरे साथ रहते थे। मैंने कहा, ‘अमरेन्दु जी (निकट से जाननेवाले लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते थे) हिन्दी साहित्य में तो एक नये टॉपिक की शुरुआत हो गई-‘ससुर-जामाता प्रसंग।’ यह स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। इसका विरोध होना चाहिए। उन्होंने पूछा, ‘लेकिन  कैसे ?’ ‘ऐसा कीजिए कि हम दोनों ही लेख लिखते हैं और उसे ठीक इसी तरह ऊपर-नीचे छपाया जायेगा’-मैंने कहा। पहले-तो उन्होंने साफ इनकार किया। लिखने ही को राजी न हुए। बोले, ‘दोनों मेरे शिक्षक हैं (अपूर्वानंद उन दिनों हिन्दी विभाग में जे. आर. एफ. थे; अतएव पढ़ाया भी करते थे), रोज कक्षा में देखा-देखी (टोका-टोकी) होगी, इसलिए कुछ ठीक नहीं लगता।’ मैंने प्रतिबद्धता और ईमानदारी की प्रत्यंचा चढ़ाई। कहा-‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?’ लेकिन टस से मस न हुए। फिर मैंने कहा, ‘अच्छा ऐसा कीजिए कि आप कोई बिल्कुल ही ‘अहिंसक’ प्रकृति का लेख लिख डालिए। बाकी मैं देख लूँगा।’ अब मामला तय हो चुका था। हम दोनों  सड़क पर आये। मुझे सिगरेट की लत थी। अमरेन्दु जी ने ‘गुलाब छाप’ गुल का डिब्बा लिया। कमरे में आकर दोनों शांतचित्त  एवं दत्तचित्त  हो हाथ में कलम पकड़ बैठ गये। चेहरे पर जो तनाव था वह बता रहा था कि हमलोग ‘शत्रु-दल’ के व्यूह में प्रवेश कर चुके हैं। लगभग आध घंटे के परिश्रम से मैंने लेख तैयार कर डाला। शीर्षक लगाया-‘आलोचना की राजनीति’ (प्रकाशन तिथि: 25 फरवरी, 1989)। और काफी गुल फाँक  चुकने के बाद अमरेन्दु जी ने लिखा ‘सूनी बावड़ी में लाल कन्हेर फूलों की महक।’ दोनों ही लेख मैंने इन्द्रकांत मिश्र को थमा दिये। साहित्य के अगले अंक में ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे हम दोनों  ही के लेख छपे। अलबत्ता ‘वातायन’ कॉलम की जगह छपा ‘वातायन पर दस्तक’। इस हालत में लेख छपा पाकर मैं रोमांचित हो उठा। ‘साहित्य के मठ’ पर यह मेरा पहला ‘हमला’ था ।

Monday, August 16, 2010

कुत्ता बनना, पत्रकार न बनना

मणिकांत ठाकुर
दरअसल लिखने और छपने की मेरी लालसा बड़ी पुरानी (आदिम) रही है। जब मैं नौवीं कक्षा में था तो इतिहास की एन.सी. ई. आर. टी. पुस्तक सभ्यता की कहानी पढ़कर ‘पूँजीवाद का अवश्यंभावी पतन’ शीर्षक से एक लेख लिखा और अपने गाँव में एक पड़ोसी से उसे टंकित कराया। उस टंकित रूप ने मुझे जो सुख प्रदान किया वह आज तक अभूतपूर्व लगता है। इस लालसा को हवा तब लगी जब मैं कॉलेज में दाखिल हुआ। शुरुआती मित्रों में चन्द्रसेन था जिसकी लिखने-छपने में अभिरुचि थी और फिर सियाराम शर्मा थे जिनकी कविताएँ हमलोग रेडियो पर साथ-साथ सुनते थे। लालसा अब रोग बनने जा रही थी। तब पाटलिपुत्र टाइम्स में चन्द्रसेन की राजेन्द्र यादव के शीर्षक की नकल में ‘टुकड़े-टुकड़े ताजमहल’ कहानी छपी। मैं भी इतिहास से संबंधित किसी विषय पर एक लेख लिखकर संपादक से जा मिला। उन्होंने कहा, ‘यह प्रकाशन के स्तर का नहीं है।’ मैंने पूछा, ‘आपका क्या मतलब ?’ ‘अखबार के लायक बनाइए’, उन्होंने  सलाह दी। निराला की मुद्रा धारण कर मैं लौट आया। जहाँ तक याद है, पाटलिपुत्र टाइम्स के संपादकीय विभाग में मणिकांत  ठाकुर थे। यह जानकारी उन्हीं दिनों चन्द्रसेन ने दी थी।

अब मैं विद्युत बोर्ड कॉलोनी, शास्त्रीनगर में रहने लगा था। मित्र शैलेन्द्र ने मुझे बताया कि आत्मकथा एक ऐसा निर्भीक अखबार है जो मेरी चीजों को छाप सकता है। लेख मेरे पास थे ही इसलिए संपादक से मिलने में मैंने कोई देर न की। इस अखबार ने या कि संपादक ने अपनी ‘निर्भीकता’ साबित की और ‘साहित्य और उसका चरित्र’, ‘प्रेमचंद और उनका प्रगतिशील साहित्य’ ‘सेवासदन और नारी स्वाधीनता’ जैसे मेरे कई लेख प्रकाशित किये। इसके संपादक  रामविलास झा थे। हाँ, इतना याद है कि लेख छपने पर मैंने साथ रह रहे छोटे-बड़े भाइयों के बीच टॉफियाँ बाँटी थी। आत्मकथा अखबार स्टॉलों पर कहीं दीखता न था इसलिए इसे प्राप्त करने के लिए मैं अखबार के हॉकरों की तरह सुबह-सुबह उठता और सायकिल लिए प्रेस पहुँच जाता। आत्मकथा में छपे सारे लेख मेरी फाइल में आज भी सुरक्षित हैं।

सन् 87 की बात है जब मैं जनशक्ति में लिखने-छपने की योजना बनाने लगा। वहाँ इन्द्रकांत मिश्र थे। मैं उन्हें पसंद आ गया और मुझे बेहिचक हू-ब-हू छापने लगे। यहाँ तक कि शीर्षक बदलने के ‘मौलिक अधिकार’ तक का भी वे इस्तेमाल न करते। मुझे छापते और कहते-‘तुम आग लिखते हो’। वे छापते गये क्योंकि संपादक से अधिक एक ‘विद्रोही व्यक्ति’ हो गये थे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (पार्टी के अंदर के कुछ लोग मजाक में इसे ‘सर्कुलर पार्टी ऑफ इंडिया’ कहने लगे हैं। देखें प्रकाश लुइस की नक्सलाइट मुवमेंट पर छपी किताब ‘द नक्सलाइट मुवमेंट इन सेंट्रल बिहार,’  पृष्ठ 141, पाद टिप्पणी संख्या 32) में निष्ठापूर्वक काम करते हुए निजी जीवन में उन्होंने जो ‘असफलता’ हासिल की थी, उससे उनके तेवर बदल गये थे। एक पत्रकार होते हुए भी मुझे पत्रकार न बनने की सलाह (हिदायत कहिए) देते। कहते-‘राजू, किसी का कुत्ता बनना पत्रकार न बनना ।’ मैं जानता था, दर्द के सागर में हैं वे।

Tuesday, August 10, 2010

शब्दों की दुनिया में

राजेंद्र यादव
पंकज बिष्ट


अपने संस्मरण का यह टुकड़ा मैंने प्रकाशनार्थ पटना में जनशक्ति (सी. पी. आई. का साप्ताहिक मुखपत्र) के उपेन्द्रनाथ मिश्र और दिल्ली में ‘साखी’ के प्रेम भारद्वाज को दिया। दोनों ही ने अपने-अपने कारणों से इसे प्रकाशित करना मुनासिब नहीं समझा। मिश्र जी ने तो चालाकी भरी चुप्पी साध ली। किंतु भारद्वाज जी ने कहा कि आलोक धन्वा वाले प्रसंग को मैं हटा लूं। ऐसा करना मेरे लिए लगभग असंभव है, अतएव मैं पूरा पाठ यहां किस्तों में प्रस्तुत कर रहा हूं। फिलहाल इसकी पहली किस्त पढ़ें।  

कउन बात अइसन अँतड़ी में...

लगभग बीस साल पहले (शायद सन् 91) मैंने पंकज बिष्ट का उपन्यास लेकिन दरवाजा पढ़ा था; बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि इस उपन्यास से मैंने पंकज बिष्ट को जाना। आज उस पूरे उपन्यास में से इतना भर याद रह गया है कि एक ‘नवोदित’ रचनाकार ‘कपिल’ का लेख पत्र-पत्रिकाओं में नहीं छपता तो मित्रों की सलाह अथवा स्वयं की बुद्धि से (यह भी याद नहीं) लिंग परिवर्तन कर अपना नाम ‘कपिला’ कर लेता है तो न सिर्फ उसका लेख ‘छपने लायक’ या ‘स्तरीय’ हो जाता है बल्कि पत्रों के माध्यम से संपादक उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने की ‘अंतिम इच्छा’ भी प्रकट करते हैं। ठीक जैसे कई दिग्गज और धाकड़ साहित्यकारों (संपादक राजेन्द्र यादव समेत) ने स्नोवा बार्नो के प्रसंग में रुचि एवं तत्परता दिखाई। (प्रसंगवश, मुझे गुजराती भाषा के कथाकार पीताम्बर पटेल की कहानी ‘आत्मा का सौंदर्य’ याद आ रही है जिसमें पूर्णिमा पत्रिका का संपादक नरेन्द्र शर्मा, कवयित्री श्रीलेखा के काव्य एवं देह-सौंदर्य के ‘प्रशंसक’ व ‘उपासक’ बन चुके हैं और ‘व्यक्तिगत रूप से मिलने’ या कि ‘उसके घर ठहरने’ की अदम्य ‘लालसा’ प्रकट करते हैं। लेकिन मिलते ही कवयित्री की ‘कुरूपता’ की वजह से उनकी सौंदर्योपासक चेतना काफूर हो जाती है)। लेकिन दरवाजा का वह प्रसंग अगर आज भी याद है तो उसका श्रेय ‘साहित्य की राजनीति’ को है न कि मेरी बौद्धिक क्षमता का तकाजा है यह। वैसे देश और समाज में, जहाँ साहित्यकार ‘न लिख पाने का संकट’ से परेशान थे और लगातार गोष्ठियाँ आयोजित कर रहे थे, मैं ‘न छपने का संकट’ से जूझ रहा था। (यह समस्या कमोबेश आज भी बरकरार है। ये तो मित्र लोग हैं जो यदा कदा छापते रहते हैं। मैं आभारी हूँ  कुमार मुकुल, मधुकर सिंह एवं प्रेमकुमार मणि का जो आग्रह कर मुझसे लिखवाते हैं। मैं आभारी हूं सुलभ जी का जिन्होंने कभी काट-छांट नहीं की।) कभी मैंने राजेन्द्र यादव जी को हंस के लिए, यह ध्यान में रखते हुए, कि प्रेमचंद कभी इसके संस्थापक रहे थे, ‘प्रेमचंद: सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद’ (यह लेख लगभग दस साल बाद रामसुजान अमर के सदुद्योग से सहमत मुक्तनाद के प्रेमचंद विशेषांक में छपा।) शीर्षक से एक लेख भेजा था। आश्वस्त था कि छपना ही छपना है, लेकिन जवाब आया कि ‘लेख अच्छा है, लेकिन फिलहाल उपयोग सम्भव नहीं है।’  एक धक्का-सा लगा और गुस्सा भी आया कि ‘साहब! अगर लेख अच्छा है तो न छापना कौन-सी अक्लमंदी का काम हुआ? ’ निराला याद आए। आसंपादकों  के बारे में उनके अनुभव काम आये। मगही के गीतकार मथुराप्रसाद नवीन याद आए-‘कउन बात अइसन अँतड़ी में दाँत कहे में कोथा, कि कवि जी कलम हो गेलो भोथा’।