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नंदकिशोर नवल |
जनशक्ति से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। बात सन् 89 की है।
नंदकिशोर नवल उन दिनों इस अखबार में नियमित लिख रहे थे। संभवतः साहित्य पृष्ठ पर
‘वातायन’ कालम में।
नवल जी को मैं आदर के साथ पढ़ता था। शायद उससे पहले ही कम्युनिस्ट पत्रिका में मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र (हू-ब-हू शीर्षक याद नहीं) पर छपा उनका लेख पढ़ चुका था और मैं उसकी गिरफ्त में था। घटना यह है कि हंस में
गिरिराज किशोर की एक छोटी-सी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी ‘
प्रेमचंद की तरह लिखना आसान है
जैनेन्द्र की तरह मुश्किल’। इसे पढ़कर मैं तिलमिला गया था। यह नहीं कि
जैनेन्द्र को मैं छोटा लेखक मानता था, बल्कि
प्रेमचंद के संदर्भ में कही गई बात मेरे मार्क्सवादी दिल (कुछ मित्र ‘मार्क्सवाद में दिल’! पर कानाफूसी करेंगे) को लग गई। इसी समय
नवल जी एवं
अपूर्वानंद का लेख
जनशक्ति में छपा। मजेदार बात यह थी कि
नवल जी का लेख ऊपर के आधे हिस्से में छपा था और नीचे के बाकी बचे हिस्से में
अपूर्वानंद द्वारा अनूदित रूसी कवियों की कविताएँ थीं। उन दिनों हिन्दी, एम. ए. में पढ़ रहे
अमरेन्द्र कुमार मेरे साथ रहते थे। मैंने कहा,
‘अमरेन्दु जी (निकट से जाननेवाले लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते थे) हिन्दी साहित्य में तो एक नये टॉपिक की शुरुआत हो गई-‘ससुर-जामाता प्रसंग।’ यह स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। इसका विरोध होना चाहिए। उन्होंने पूछा, ‘लेकिन कैसे ?’ ‘ऐसा कीजिए कि हम दोनों ही लेख लिखते हैं और उसे ठीक इसी तरह ऊपर-नीचे छपाया जायेगा’-मैंने कहा। पहले-तो उन्होंने साफ इनकार किया। लिखने ही को राजी न हुए। बोले,
‘दोनों मेरे शिक्षक हैं (
अपूर्वानंद उन दिनों हिन्दी विभाग में जे. आर. एफ. थे; अतएव पढ़ाया भी करते थे), रोज कक्षा में देखा-देखी (टोका-टोकी) होगी, इसलिए कुछ ठीक नहीं लगता।’ मैंने प्रतिबद्धता और ईमानदारी की प्रत्यंचा चढ़ाई। कहा-‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?’ लेकिन टस से मस न हुए। फिर मैंने कहा,
‘अच्छा ऐसा कीजिए कि आप कोई बिल्कुल ही ‘अहिंसक’ प्रकृति का लेख लिख डालिए। बाकी मैं देख लूँगा।’ अब मामला तय हो चुका था। हम दोनों सड़क पर आये। मुझे सिगरेट की लत थी।
अमरेन्दु जी ने
‘गुलाब छाप’ गुल का डिब्बा लिया। कमरे में आकर दोनों शांतचित्त एवं दत्तचित्त हो हाथ में कलम पकड़ बैठ गये। चेहरे पर जो तनाव था वह बता रहा था कि हमलोग ‘शत्रु-दल’ के व्यूह में प्रवेश कर चुके हैं। लगभग आध घंटे के परिश्रम से मैंने लेख तैयार कर डाला। शीर्षक लगाया-
‘आलोचना की राजनीति’ (प्रकाशन तिथि: 25 फरवरी, 1989)। और काफी गुल फाँक चुकने के बाद
अमरेन्दु जी ने लिखा
‘सूनी बावड़ी में लाल कन्हेर फूलों की महक।’ दोनों ही लेख मैंने
इन्द्रकांत मिश्र को थमा दिये। साहित्य के अगले अंक में ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे हम दोनों ही के लेख छपे। अलबत्ता
‘वातायन’ कॉलम की जगह छपा
‘वातायन पर दस्तक’। इस हालत में लेख छपा पाकर मैं रोमांचित हो उठा।
‘साहित्य के मठ’ पर यह मेरा पहला
‘हमला’ था ।
एक क्रान्ति की शुरुवात.
ReplyDeleteअच्छा लगा पढ़कर.