अखिलेश कुमार |
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अपूर्वानन्द |
हंसकुमार पांडेय और मेरे बड़े भाई अखिलेश कुमार सैदपुर छात्रावास के एक ही कमरे में रहते। हंसकुमार जी कहानी लिखने में ही नहीं, सुनाने में भी विश्वास रखते थे। आदतवश वे अक्सर ही कथा-वाचन की सीमा-मर्यादा लांघ जाते। उनकी इस आदत पर मेरे भाई तनिक क्षुब्ध होते और कहते, ‘पांडेय जी, आप कहानियां लिखते हैं। अतएव पढ़ना-लिखना आपके लिए अनिवार्य शर्त की तरह नहीं है। अनुभूति और संवेदना के औजार से ही आपका काम चल जायेगा। मै ठहरा इतिहास का विद्यार्थी। (वैसे पांडेय जी भी इतिहास ही के छात्र थे और फिलहाल केंद्रीय विद्यालय में इतिहास के शिक्षक हैं।) सो मेरे लिए पढ़ना आवश्यक है। इसलिए आप अपनी ‘वाचिक परंपरा’ के विस्तार के लोभ का तनिक संवरण करेंगे तो बेहतर होगा।’ उस क्षण तो वे चुप लगा जाते लेकिन इधर से थोड़ी भी नरमी देखते तो फिर से शुरू होने की जुगत में लग जाते।
पांडेय जी की कहानियों में नंदकिशोर नवल, अरुण कमल, तरुण कुमार, अपूर्वानंद एवं कवि शील होते। कभी-कभी वे मघड़ा (नालंदा) अयोध्यानाथ सांडिल्य (धरातल पत्रिकावाले) का भी नाम लेते। वे कमरे में आते और कहानी शुरू हो जाती। एक शाम वे अपने कमरे में दाखिल होते ही चहकते हुए बोले, ‘अखिलेश, आज की चांदनी बड़ी प्यारी लग रही है।’ यह कहानी की शुरुआत नहीं थी बल्कि कहानी प्रारंभ करने के लिए भूमिका तैयार की जा रही थी। यह एक तरह से श्रोता की ‘हेलो, माइक टेस्टिंग’ थी। मेरे भाई साहब शायद कहानी के लिए तैयार न थे। इसलिए बोले, ‘हां, आज मेरी भी मुलाकात नवल जी से हुई। वे भी बोले कि ‘आज की चांदनी बड़ी प्यारी लग रही है।’ और हां, ‘अपूर्वानन्द भी कुछ-कुछ ऐसा ही कह रहे थे।’ इतना सुनना था कि पांडेय जी पके बैगन की भांति गरम हो उठे। बोले, ‘अखिलेश, तुम्हें क्या लगता है कि मैं जो कुछ भी बोलता-कहता हूं नवल जी का प्रचार करता हूं ?’ ‘मैंने ऐसा कब कहा?’ भाई साहब ने हस्तक्षेप किया। पांडेय जी बोलते रहे, ‘अरे, मैंने क्या समझा था कि इतिहास का नीरस और उबाऊ तथ्य पढ़ते-पढ़ते सौंदर्य-चेतना से तुम इतने शून्य हो गये हो कि चांद-तारों की बात भी बर्दाश्त नहीं कर सकते ?’ आदि...आदि।
पांडेय जी अपने बचपन की एक कहानी सुनाते। कहानी थी कि बचपन में उन्हें दुनिया के बाकी सभी बच्चों की तरह ही पढ़ते-पढ़ते सो जाने की बीमारी थी। उनके पिता गांधीवादी मूल्यों को ढोनेवाले शिक्षकों की अंतिम पीढ़ी के थे। वे जब विद्यालय से वापस घर आते तो पाते कि हंसकुमार सोया पड़ा है। त्योरी चढ़ जाती। हल्की डांट भरी एक आवाज लगाते-‘हंसकुमार सुतल बानी का ?’ ‘ना तऽ ’, पांडेय जी कहते और पिता से नजरें बचाते हुए आंख मलने लगते। दूर नेपथ्य से मां की आवाज आती-‘सुतल ना बानी। देखत नइखीं लड़िका के, पढ़त-पढ़त आंख लाल हो गइल बा।’ पिताजी तब तक थोड़ा सुस्ता रहे होते। फिर अपना कोट उतारते और बोलते, ‘सूतीं सूतीं, रउआ ना सूतब राउर तकदीर सूती। ’ तब तक मां का कथन भी जारी रहता। पिता जब अपने हिस्से का सारा इतमीनान और साहस बटोरकर कुर्सी पर बैठ चुके होते तो कुछ-कुछ अंतिम फैसले की शक्ल में बोलते-‘भीखो ना मिली।’ मां को यह तनिक गंवारा न होता और जोर-जोर से बोलने-चिल्लाने लगतीं-‘मिली ना त का ,ना मिली, मिली। भीख जरूर मिली।’ पिता कुर्सी में धंस चुके होते।
पांडेय जी कहानियां लिखते और स्थानीय अखबार जनशक्ति में प्रकाशित होतीं। उन दिनों इस अखबार में रचनाकारों की तस्वीरें भी छपती। एक लेखक के लिए इससे बड़ा सुख क्या होता। जिस दिन उनकी कहानी छपती, अखबार खरीदते और किसी भी दिशा की बस पकड़ लेते। बस में थोड़ी भी जगह मिलती कि अखबार फैला देते। अगर वे ऐसा करने में अक्षम होते तो सीट पर बैठे सज्जन उनके हाथ से अखबार झटक लेते। पाठक की नजर अगर अखबार में छपी तस्वीर पर जाती तो थोड़े विस्मय के साथ पांडेय जी के मुखड़े से उसका मिलान करता। भ्रम दूर होने पर वह पांडेय जी से पूछता-‘ये छपी हुई तस्वीर आपकी है क्या?’ ‘जी, मैं ही वो नाचीज हूं’, पांडेय जी का छोटा और अति विनम्र जवाब होता। यह प्रश्नोत्तरी लगभग भर दिन चलती।
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